डियर आयुषी,बहनें अपने भाइयों की ऑनर किलिंग का हिस्सा नहीं बनतीं

अगर सभी बेटियों के बाप इतनी कोमलता से भरे हैं तो बेटियों की हालत इतनी खराब क्यों है

आशुतोष चचा आशुतोष चचा
फरवरी 14, 2019

आप पढ़ रहे हैं हमारी सीरीज- 'डियर आयुषी'. रिलेशनशिप की इस सीरीज में हम हर हफ्ते 'चचा' की एक चिट्ठी पब्लिश करेंगे. वो चिट्ठी, जिसे वह अपनी बेटी आयुषी के लिए लिखते हैं. इन चिट्ठियों से आपको ये जानने को मिलेगा कि एक पिता अपनी बेटी के लिए क्या चाहता है. ये चिट्ठियां हर उस पिता की कहानी बयान करेंगी, जिनके लिए उनकी बेटी किसी 'परी' से कम नहीं होती, जिनके लिए उनकी बेटी कुदरत की सबसे प्यारी रचना होती हैं. 

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डियर आयुषी,

तुम्हारी वजह से हालत खराब हो गई है. लिखना पढ़ना सब बंद है. लिखने के लिए एकाग्रता चाहिए, जो तुम्हारे सोने के बाद मिलती है. तुमको सुलाने के चक्कर में खुद सो जाते हैं. फिल्में देखना चाहें तो साथ बैठकर टुकुर टुकुर देखती रहती हो. सारा टाइम तुम्हारे साथ खेलना मेरी ड्यूटी है. रोज़ नए-नए खेलों का आविष्कार करती हो. मजा हमको भी खूब आता है तुम्हारे साथ खेलने में. लेकिन क्या करें, हमारे पास है काम. ढेर सारा काम. वो काम न भी कर रहा होऊं तो उसके बारे में सोच रहा होता हूं. इसी चक्कर में दुनिया से कट-पिट गए हैं.

एकदम से कट गए हों ऐसा भी नहीं है. अपने मम्मी पापा से बात जरूर करते हैं. ऐसे ही एक दिन मम्मी ने, मेरी मम्मी ने फोन करके कहा था कि अब एक बेटा भी होना चाहिए. आयुषी बड़ी हो गई है. उसको साथ खेलने के लिए कोई चाहिए. उनकी बात में मुझको दम लगा. अपना सिरदर्द किसी और को देकर कितना मजा आता है. दो बच्चे साथ में लड़ें. सिर फोड़ें, अपने को क्या. फिर उन्होंने कहा कि संपत्ति का वारिस भी तो चाहिए. फिर तो मेरे फेफड़े फूल गए. मैंने कहा, हां यार. अगर बेटा नहीं हुआ तो ये दिल्ली का लालकिला खाली पड़ा है, फतेहपुर में वो बड़ा सा दरवाजा फेंका हुआ है, आगरे में दो प्रॉपर्टीज टूरिस्ट्स के लिए छोड़ रखी हैं, ये सब किसके नाम करूंगा.

ये सुनकर मम्मी भी हंसने लगीं. उनका चलता है, वो कुछ भी कह सकती हैं. लेकिन मेरी शादी से भी पहले मुझे पता था कि मेरी बेटी होगी. क्योंकि मेरी इच्छा यही थी. जब तुम पैदा हुई तो मैं बहुत खुश था. अपने हाथ के अंगूठे के बराबर तुम्हारे पैर का पंजा देखा. तुम्हें गोद लेने में भी डर लग रहा था कि हाथ से दब न जाओ. 24 साल की उम्र थी मेरी उस वक्त. इतना सब कुछ इतनी जल्दी देख लिया था. यहां लोग 35-40 साल की उम्र तक बच्चे के लिए तैयार नहीं रहते. मैं बिना तैयारी के तैयार बैठा था. अब तुम्हें देखकर लगता है कि तुम मेरे साथ साथ बड़ी हो रही हो. अगले 8-10 साल में तुम मुझसे भी बड़ी हो जाओगी.

मैंने फिल्मों में देखा, कहानियों में पढ़ा, शायरों-कवियों से सुना, सब बेटियों का महिमागान करते हैं. मुझे कभी न समझ में आया कि अगर सभी बेटियों के बाप इतनी कोमलता से भरे हैं तो बेटियों की हालत इतनी खराब क्यों है. बेटी को बचाने के नारों की जरूरत क्यों पड़ती है. मैंने देखा कि इधर तीन-चार दिन मेरी तबीयत खराब थी. तुम अपने नन्हें हाथों से मेरा सिर दबाती रहती थी. बड़ी देर तक, बिना थके. तुम्हारे छोटे हाथों की छुअन भर से मेरा दर्द खतम हो जाता है. और मैंने हर बेटी को ऐसे ही देखा है. जो अपने परिवार को हर तकलीफ से बचा लेना चाहती है. बेटियां अपने पापा को संभालती हैं, जब उनको तकलीफ हो तो वो दादी अम्मा बनने लगती हैं. बहन हों तो वो भाई के राज़ छिपाकर रखती हैं. बहनें अपने भाइयों की ऑनर किलिंग का हिस्सा नहीं बनतीं. इतनी संवेदना और इतना प्यार बेटियों के पास ही होता है. सारी दुनिया बेटियों जैसी होती तो कितना अच्छा होता.

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