डियर आयुषी, एक बात याद रखना, कि सब कुछ याद रखना जरूरी नहीं

गलत बातों को अपने मन में सहेजकर मत रखो. वो जितनी देर तक तुम्हारे अंदर रहेगी, मन कड़वा करती रहेगी

आशुतोष चचा आशुतोष चचा
नवंबर 01, 2018

डियर आयुषी, 

तुम मुझे अक्सर एक चीज याद दिलाती रहती हो. कि पापा आपने मुझे मार मारकर पढ़ाया था. एक दिन मुझे नहीं याद हो रहा था तो दो कंटाप मारे थे. ये कोई 6 महीने पुरानी बात होगी. लेकिन दो कंटाप जैसे तुमने याद रखे हैं वैसे वो लेसन नहीं याद किया जिसके लिए पड़े थे. मैं जब भी तुम्हें प्यार जताता हूं तो तुम ताना देने लगती हो. 'पापा आपने मुझको मारा था न कंटाप से.' मैं हर बार सोचने लगता हूं कि कब मैंने मार दिया तुमको. फिर तुम वही 6 महीने पुरानी कहानी सुनाने लगती हो. मुझे इस बात का बेहद पछतावा है कि मैंने तुमको दो कंटाप मारे. लेकिन तुम भी ये याद रखकर ठीक नहीं कर रही. हां, अभी तुम्हारा बाल मन है तो सब सहेजकर रखो. लेकिन आगे के लिए ये सही प्रैक्टिस नहीं है. पापा जब आपको प्यार कर रहे हों तो बुरी बातें नहीं याद रखते.

आप पढ़ रहे हैं हमारी सीरीज- 'डियर आयुषी'. रिलेशनशिप की इस सीरीज में हम हर हफ्ते 'चचा' की एक चिट्ठी पब्लिश करेंगे. वो चिट्ठी, जिसे वह अपनी बेटी आयुषी के लिए लिखते हैं. इन चिट्ठियों से आपको ये जानने को मिलेगा कि एक पिता अपनी बेटी के लिए क्या चाहता है. ये चिट्ठियां हर उस पिता की कहानी बयान करेंगी, जिनके लिए उनकी बेटी किसी 'परी' से कम नहीं होती, जिनके लिए उनकी बेटी कुदरत की सबसे प्यारी रचना होती हैं. 

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तुम्हें बताऊं कि मुझे भी अपनी एक पुरानी नौकरी याद है. ये शायद 2008-10 का वक्त था. मैं लखनऊ में एक प्राइवेट जॉब करता था. नाइट शिफ्ट में. तकरीबन डेढ़ साल रात में काम करने के बाद मुझे महसूस हुआ कि मेरी याददाश्त काफी कमजोर हुई है. मैं बहुत सी चीजें भूल जाता हूं. हालांकि ये मेरा बहाना भी हो सकता है भुलक्कड़ी का. अब तुम ये कहकर न चिढ़ाना कि याददाश्त कमजोर हो गई तो ये कैसे याद है कि नाइट शिफ्ट में जॉब करते थे? मैं गजनी वाला आमिर खान नहीं हुआ हूं. उस नौकरी के बाद मोबाइल रिपेयरिंग का कोर्स किया और गांव में दुकान खोली. ये सब याद है.

लेकिन मैं बहुत सी बातें भूल गया हूं, जिन्होंने मुझको तकलीफ पहुंचाई. मां बाप से लेकर बेहद करीबी लोगों द्वारा कहे कड़वे प्रवचन मुझे याद नहीं है. अभी मैं ये लिखने बैठा हूं और सोच रहा हूं कि किसी की कोई बात याद आ जाए, जिसे मैं लिख सकूं कि इसको भूल गया. फिर भी याद नहीं आ रही. मैंने अक्सर ऐसा देखा है कि किसी से सौ बातें प्यार की करो लेकिन एक गुस्से में सुना दो तो सौ प्यार की बातें अपनी जगह खो देती हैं. उनकी जमीन पर वो एक तीखी बात अपनी मल्टी स्टोरी बिल्डिंग खड़ी कर लेती है. इससे तीखी बात कहने वाले को कोई नुकसान नहीं होता. उसे तो कई बार एहसास भी नहीं होता कि उसने कोई गलत बात की है. वो कहकर आगे बढ़ जाता है. जिंदगी में नए एडवेंचर करता है. हम वहीं अटके रह जाते हैं उस एक बात के साथ, अपना खून जलाने के लिए.

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तुम्हें पता है कि हमारे आस पास निगेटिव लोग इतने ज्यादा क्यों हैं? वो इसीलिए हैं क्योंकि वो सब अच्छी बातें, अच्छे अनुभव याद नहीं रखते. और कड़वाहट भूलते नहीं. जब तुम मेरे सामने शिकायतों का पिटारा खोलती हो तो तुम्हारे पहले शब्द होते हैं- पापा आज न, रुद्र ने मुझे पागल कहा. वो नॉटी है. और मैं तुम्हारी शिकायत को वहीं तेज धार वाली ब्लेड से काट देता हूं और कहता हूं कि वो नासमझ है. उसको मालूम नहीं आप कितनी अच्छी हो. उसे आपसे कैसे बात करनी चाहिए ये पता नहीं है. उसका कहना तुम भूल जाओ, और बातें बताओ. उसके बाद तुम अच्छी अच्छी बातें बताना शुरू करती हो. कि आज कौन लंच में क्या लाया था. और मैंने तुम्हें मैगी न देकर कितना बड़ा पाप कर दिया. 

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यहां अगर तुम्हारी शिकायत के बाद मैं तुममें निगेटिविटी भरने लगूंगा तो तुम अभी से डिप्रेशन की शिकार हो जाओगी. अब तुम पूछोगी कि पापा, अगर किसी की बात बुरी लगती है, और हम उसको याद नहीं रखना चाहते. इसके लिए क्या करें? मैं कहूंगा कि उस बात का उसी जगह निपटारा कर दो. अगर तुम्हें रुद्र ने पागल कहा तो वहीं उससे तेज़ आवाज़ में मैम से उसकी शिकायत करो. अगर पापा की कोई बात बुरी लगती है तो आप तुरंत बोलती हो न कि पापा ये ठीक नहीं है. आप मुझको मारो या डांटो मत. ऐसे ही मम्मी से भी कहा करो. ऐसे ही अपने दोस्तों से भी कहो. बस गलत बातों को अपने मन में सहेजकर मत रखो. वो जितनी देर तक तुम्हारे अंदर रहेगी, मन कड़वा करती रहेगी. एक बात याद रखना, कि सब कुछ याद रखना जरूरी नहीं.

 

 

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