डियर आयुषी,समझदारी का बालिग होने से कुछ लेना देना नहीं है.

आजकल 15 साल के लड़के अपने नाम से ऐप पेटेंट करा रहे हैं

आशुतोष चचा आशुतोष चचा
जनवरी 17, 2019
सांकेतिक इमेज- Pixabay

आप पढ़ रहे हैं हमारी सीरीज- 'डियर आयुषी'. रिलेशनशिप की इस सीरीज में हम हर हफ्ते 'चचा' की एक चिट्ठी पब्लिश करेंगे. वो चिट्ठी, जिसे वह अपनी बेटी आयुषी के लिए लिखते हैं. इन चिट्ठियों से आपको ये जानने को मिलेगा कि एक पिता अपनी बेटी के लिए क्या चाहता है. ये चिट्ठियां हर उस पिता की कहानी बयान करेंगी, जिनके लिए उनकी बेटी किसी 'परी' से कम नहीं होती, जिनके लिए उनकी बेटी कुदरत की सबसे प्यारी रचना होती हैं. 

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डियर आयुषी,

तुमको तुम्हारे दोस्त के साथ खेलते देखकर लगा कि तुम इतनी ही बड़ी रहो. तुम बड़ी होकर कहीं मुझसे होशियारी न झाड़ने लगो. ये मासूमियत फिर मैं कहां पाऊंगा. अभी तुम मम्मी से झगड़कर पापा की गोद में बैठ जाती हो. 'अच्छे अच्छे पापा' कहकर मम्मी को चिढ़ाती हो. मुझसे गुस्सा होकर मम्मी की गोद में बैठ जाती हो. हाथ फैलाकर बताती हो कि तुम उनको इतना प्यार करती हो. और मुझको चुटकी भर. और दोनों से गुस्सा होकर कहती हो 'पता नहीं भगवान ने मुझे कैसे मां बाप दे दिए हैं. दोनों के दोनों गंदे.' बड़ी हो जाओगी तो तुम ये चालबाजियां करना भूल जाओगी. तब तुम वो होशियारी करोगी जो हम पकड़ नहीं पाएंगे. 

मैं एक दिन बैठा सोच रहा था कि तुम कितनी बड़ी हो जाओगी तो मैं तुम्हें समझदार मानने लगूंगा. और तुम्हारे कामों में टांग अड़ाना बंद कर दूंगा. हालांकि तुम पर ज़ोर अब भी नहीं चलता है लेकिन रोकता तो हूं ही. तुम चाकू उठाकर खेलती हो तो छीनकर रख देता हूं. छत की रेलिंग पर लटकती हो तो डांटता हूं. समझाता हूं कि गिर जाओगी. तुम पूछती हो कि 'फिर आपको प्यारी प्यारी बच्ची नहीं मिलेगी?' मैं दोबारा ऐसी बात मुंह पर न लाने को कहकर चुप करा देता हूं. तुम मान जाती हो, थोड़ी देर बाद फिर वापस वहीं पहुंच जाती हो. 

family-2655509_1920-750x500_011719101837.jpgसांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे

ये सोचते हुए मैंने तय किया कि जिस दिन तुम हाथ छुड़ाकर सड़क पर उछल उछलकर चलना बंद कर दोगी. अपनी हरकतों से हमारा कलेजा कंपाना बंद कर दोगी और अपनी चिंता हमारे बराबर करने लगोगी, उस दिन से मैं तुमको समझदार मान लूंगा. क्योंकि तब तुम अपना भला बुरा समझने लगोगी. बाकी की जो चिंता मां बाप करते हैं वो तो जिंदगी भर रहती है. हम ही कहां इतने समझदार हो गए हैं जो फ्यूचर देख लिया करें. अभी भी अपनी साल भर पहले की हरकतों पर नजर जाती है तो लगता है कितनी नादानी कर दी. और ये जिंदगी भर रहने वाला है. इंसान जिंदगी भर सीखता रहता है. कभी समझदार नहीं होता. बालिग होने का पैमाना हमारे यहां 18 साल की उम्र है. यही कहीं 16 है तो कहीं 14. लेकिन हमने देखा है कि आजकल 15 साल के लड़के अपने नाम से ऐप पेटेंट करा रहे हैं और 65 साल के बुड्ढे फेसबुक पर फ़ेक प्रोफाइल वाली लड़कियों के नीचे अपना नंबर देते हैं कॉल करने के लिए. 5 लिखकर इंतजार करते हैं कि लड़की के कपड़े उतर जाएंगे. तो समझदारी का बालिग होने से कुछ लेना देना नहीं है. 

father-551921_1920-750x500_011719101903.jpgसांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे

मैं खुद इतना बेवकूफ हूं कि तुमको ढंग से पालना भी तो आता नहीं. इसलिए मुझे कोई चिंता भी नहीं है. कि तुम क्या करोगी. क्या बनाओगी क्या बिगाड़ोगी. पढ़ाई करोगी कि लड़ाई करोगी. किसी सरकारी नौकरी की तैयारी करोगी या पैशन फॉलो करोगी. या किसी कला में खुद को माहिर बनाओगी. मां बाप की खास चिंता खासतौर से बेटियों को लेकर इस बात पर होती है कि हमारी बेटी बड़ी होकर कब किससे शादी करेगी. कहीं वो पढ़ाई लिखाई छोड़कर गलत रास्ते न पकड़ ले. गलत रास्ते का मतलब तुम समझती होगी. वो ये नहीं सोचते कि बिटिया डकैती या मर्डर वगैरह कर देगी. वो गलत रास्ता बेटियों के लिए ज्यादा गलत समझा जाता है. मुझे इसकी चिंता नहीं है. तुम्हें जो जब करना हो वो करना. मैं तो तुमको स्कूल भी न भेजता, लेकिन वो सही जगह होती है. वहां हमको दोस्त मिलते हैं और समझदारी बढ़ती है. हां, मेरे मन में छोटी सी इच्छा जरूर है कि कभी तुम्हारे नाम से मेरा नाम जाना जाए लेकिन ये सिर्फ इच्छा है, सपना नहीं. मेरे सपनों का बोझ सिर्फ मेरे कंधों तक सीमित है, तुम्हें अपने लिए नए सपने देखने होंगे.

 

 

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