इतनी लड़ाई के बाद कंगना ने अपनी नई फिल्म में क्या बघारा?

फिल्म रिव्यू : जजमेंटल है क्या

महेश भट्ट जब परवीन बाबी के किस्से सुनाया करते थे, तो उनमें से एक किस्सा ये भी था, कि किस तरह एक दिन वो परवीन के घर पहुंचे, तो उनकी मां घबराई हुई थीं. जब वो परवीन के कमरे में गए, तो उनके चेहरे का रंग उड़ गया. परवीन हाथ में चाकू लिए बैठी थीं. फुसफुसा कर बोलीं कि उन्हें लोग मारना चाहते हैं. ये पहली दफा नहीं हुआ था. उन्हें शांत कराने में महेश भट्ट खुद सहम जाते थे. कभी कुछ कहती थीं, कभी कुछ. परवीन को स्कित्ज़ोफ्रीनिया था.

पागलपन शब्द नेगेटिव है. जो नॉर्मल नहीं है, वो पागल है. ऐबनॉर्मल है. अब इस ‘ऐबनॉर्मल’ के स्पेक्ट्रम में वो भी आते हैं, जिनको मेंटल इशूज हैं. दिमाग की तारें एक दूसरे से छूते हुए चिटक जाती हैं. और वो भी हैं, जिनका व्यवहार समाज के डिब्बों में फिट नहीं होता. इन्हीं स्पेक्ट्रम्स के बीच में इधर-उधर झूलती कहानी है, जजमेंटल है क्या.

कंगना रनौत और राजकुमार राव जब पिछली बार एक साथ स्क्रीन पर आए थे, तो क्वीन जैसी मास्टरपीस फिल्म आई थी. जजमेंटल है क्या उस लकीर पर चलती-चलती खो गई सी फिल्म है.

2_072619112823.pngफिल्म में कंगना रनौत के कैरेक्टर का नाम बॉबी और राजकुमार राव के कैरेक्टर का नाम केशव है.

कहानी लिखी है कनिका ढिल्लों ने. मुख्य किरदार ले-दे कर दो हैं. बॉबी (कंगना रनौत) और केशव (राजकुमार राव). जिमी शेरगिल और अमायरा दस्तूर भी हैं. अमृता पुरी भी दिखाई देती हैं फिल्म के दूसरे हाफ में. डिरेक्शन है प्रकाश कोवलामुडी का.

ये हुई टेक्नीकल जानकारी. फिल्म की कहानी जिसका अंदाजा आपको ट्रेलर से लग गया होगा, वो यही है कि एक क़त्ल होता है. अब उसके सस्पेक्ट ये दोनों हैं. आखिर क़त्ल के पीछे की कहानी क्या है, और उसमें मेंटल हेल्थ का एंगल कैसे आता है, ये ज़रा उलझा हुआ सा सीन है फिल्म में.

कंगना का किरदार एक्यूट साइकोसिस से जूझ रहा है. इसमें व्यक्ति की दिमागी हालत ठीक नहीं रहती. इतनी बुरी हो जाती है कि असल जिन्दगी और कल्पना का अंतर भूल जाता है. अब इसी के सहारे कहानी कैसे आगे बढ़ती है, वो फिल्म देखकर ही जाना जा सकता है. कहानी लिखकर आपको सार सुनाने से फिल्म पर बात कैसे ही करेंगे हम.

दो फिल्में याद आईं, इस फिल्म को देखते हुए. एक डैरेन एरोनोफ्सकी की ब्लैक स्वान. और दूसरी एड्रियन लिन की जेकब्स लैडर. ब्लैक स्वान में लीड कैरेक्टर था नीना का, जिसे निभाया था नैटली पोर्टमैन ने. और जेकब्स लैडर में जेकब का किरदार निभाया था टिम रॉबिन्स ने. दोनों के मुख्य किरदार असलियत और कल्पना के भ्रम में घुट रहे होते हैं. जहां ये उलझन और दिमागी उठापटक नीना को उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा प्लेटफ़ॉर्म दिलाती है, वहीं जेकब के मामले में ये देखने वाले को भी अपने साथ उस अंधेरे कोने में घसीट लेती है जहां से वापस आना मुश्किल है. बेहद मुश्किल. दोनों ही फिल्में अपने समय की मास्टरपीस कही जाती हैं. नैटली पोर्टमैन को उनके किरदार के लिए ऑस्कर भी मिला था.

mental-hai-kya-rajkummar-rao_290818-125906_072619112752.jpg‘मेंटल है क्या’. के टाइटल पर ‘इंडियन साइकेट्रिएटिक सोसाइटी’ ने ऐतराज़ जताया था. इसके बाद फिल्म का नाम ‘जजमेंटल है क्या’ किया गया.

लेकिन जजमेंटल है क्या यहां थोड़ी सी पीछे छूट जाती है. फिल्म में कई पहलू ऐसे हैं जो एक्सपेरिमेंटल हैं, उनमें दिखाई देता है कि कनिका ढिल्लों का लिखा हुआ कागज़ पर कितना खूबसूरत होगा. लेकिन वही जब स्क्रीन पर आता है तो थोड़ा चूका हुआ सा लगता है. जिन लोगों ने थियेटर/संगीत की थोड़ी सी जानकारी रखी है, या उसमें उन्हें इंटरेस्ट है, वो समझेंगे कि किस तरह लाइटमोटीफ (leitmotif) का इस्तेमाल करके फिल्म में कुछ सीन्स को हाईलाईट किया गया है. लाइटमोटीफ म्यूजिक का एक छोटा सा पीस होता है जो किसी किरदार या थीम से जोड़ दिया जाता है. उदाहरण के लिए जैसे कसौटी जिंदगी की में कोमोलिका के आते ही ‘लिका....’ वाली साउंडबाइट चलती थी. तो ये लाइटमोटीफ कोमोलिका के किरदार से जुड़ा हुआ था. वैसे ही इस फिल्म में भी कुछ हिस्सों में बार-बार एक लाइटमोटीफ आता है, जिससे आप समझ जाते हैं कि आने वाले कुछ क्षणों में कुछ तो होने वाला है.

 

4_072619112859.pngकंगना की भीतरी जद्दोजहद दिखाने के लिए जिन प्रतीकों का इस्तेमाल किया गया है.

कंगना की भीतरी जद्दोजहद दिखाने के लिए जिन प्रतीकों का इस्तेमाल किया गया है, वो फिल्म के लिए थोड़े से बाहरी लगते हैं. मतलब ‘इन योर फेस’ टाइप. ये चीज़ें शायद स्टेज पर किसी नाटक में देखने को मिलतीं तो बहुत बेहतर लगतीं. रिप्रेजेंटेशन के तौर पर. लेकिन फिल्म बनाने वाले के पास चॉइस होती है कि वो अलग-अलग तरह से चीज़ों को पेश कर सकता है. ये विजुअल टूल है उसके पास. लेकिन उसका इस्तेमाल वैसा जादुई नहीं हो सका जैसा शायद लेखक या डायरेक्टर के मन में रहा हो. रतन थियाम बहुत बड़े थियेटर आर्टिस्ट हुए. अपने काम के दौरान ही उन्होंने एक बहुत सही बात कही थी, ऐसा पढ़ने को मिलता है. उनसे पूछा गया कि वो फिल्म क्यों नहीं करते, नाटक ही क्यों करते हैं. उस पर उन्होंने कहा,

“मैं नाटक इसलिए करता हूं क्योंकि फिल्म में तुम्हारा हीरो आसमान की तरफ इशारा करता है और कहता है ‘वो रहा चांद’. कैमरा उस तरफ घूमता है और थियेटर में बैठे हज़ारों लोगों को परदे पर एक सुन्दर चांद नज़र आता है. मेरे नाटक में यूं होता है कि मेरा हीरो पीछे परदे की तरफ इशारा करते हुए कहता है कि ‘वो रहा चांद’. लोगों की नज़र उसके इशारे की तरफ जाती है. परदे पर कुछ नहीं होता फिर भी थिएटर में बैठे हज़ारों लोगों को एक चांद नज़र आता है. उनके मन में छिपा हुआ. मैं लोगों को उनके मन का चांद दिखाने के लिए नाटक करता हूं.”

वो इमैजिनेशन का एक खुला रास्ता है. उस पर आप हाथों के बल भी चल लें, कोई कुछ नहीं कहेगा आपसे. इस फिल्म में उसकी गुंजाइश अगर रख छोड़ी जाती तो एक कदम और आगे निकल जाती ये फिल्म.

3_072619113600.pngफिल्म में ह्यूमर बहुत सही है. हंसी आएगी और सलीके से आएगी.

कुछ हिस्से नितांत प्रेडिक्टेबल हैं. वहां संगीत का भी कोई मतलब नहीं था. फिल्म के कुछ मिनट आसानी से कम किए जा सकते थे. जिमी शेरगिल जैसे टैलेंटेड एक्टर को एक बेहद छोटा रोल देकर नाइंसाफी की गई है. उनसे और बेहतर काम लिया जा सकता था. राम, रावण, और सीता की कहानी का एक नया तरीका सामने लाने की कोशिश में थोड़ी सी बिखर गई है फिल्म. लेकिन अभी उसके बारे में ज्यादा बात करने पर फिल्म की कहानी पर स्पॉयलर आ जाने का खतरा है. जो कि हमारा उद्देश्य कतई नहीं है. कुल मिलाकर बात ये है कि फिल्म का दिल सही जगह पर है. उसमें कोई शुबहा नहीं है. बस धड़कन ऊभ-चुभ हो गई है. इस फिल्म पर दुबारा बात होनी चाहिए. सही समय पर. तब तक के लिए बस यही कि फिल्म में ह्यूमर बहुत सही है. हंसी आएगी और सलीके से आएगी. फिल्म लिखने में कनिका ढिल्लों बहुत अच्छा काम कर रही हैं. उनके आने वाले प्रोजेक्ट्स का इंतज़ार रहेगा. ऑडनारी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था,

“हमारी परफेक्ट लाइफ तो होती नहीं है. जीवन में संघर्ष भी होता है, खुशियां भी होती हैं. मेरे किरदारों को मैं जानबूझकर कनफ्लिक्टेड या फ्लॉड नहीं बनाती. रियल लाइफ में हम सब चीज़ों से जूझते हैं. हमारी कंडीशंस, हमारी इनसिक्योरिटी (असुरक्षा की भावना) सब कुछ होता है. मेरे कैरेक्टर्स यही सब रिप्रेजेंट करते हैं, मैं उनको परफेक्ट नहीं बनाती. शायद हम परदे पर काफी लार्जर दैन लाइफ कैरेक्टर्स देख चुके हैं. उनकी लाइफ काफी स्मूद होती है. पर्सनली मेरा ये ओपिनियन है कि उन लोगों से परे नहीं हटना चाहिए जो कॉम्प्लिकेटेड हैं, या जिन्हें इशूज हैं. वो इंटरेस्टिंग और ब्रेव होते हैं. मैंने पहले भी लिखा है कि मुझे कार्डबोर्ड वाले कैरेक्टर्स पसंद नहीं हैं. ये मुझे क्या ही सिखाएंगे, क्या ही देकर जाएंगे. मेरी पुरानी किताबों, या मनमर्ज़ियां के कैरेक्टर्स ले लीजिए. ये हमें इसलिए पसंद आते हैं क्योंकि इनकी कमियों में कहीं न कहीं हम अपनी कमियां भी देख लेते हैं. इनकी विक्ट्री में हम अपनी विक्ट्री महसूस कर लेते हैं”.

एक्टिंग दोनों लीड एक्टर्स की ही बहुत बढ़िया है. कंगना और राजकुमार की परफॉरमेंस में कोई खोट नहीं. देखने लायक फिल्म है.

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