कौन हैं 'शूटर दादियां', जिन पर तापसी पन्नू और भूमि पेडनेकर की फिल्म 'सांड की आंख' बन रही है

उनकी कहानी सुनकर आपका मुंह खुला का खुला रह जाएगा.

लालिमा लालिमा
अप्रैल 16, 2019
'सांड की आंख' फिल्म का पोस्टर, असल जिंदगी की शूटर दादियां जिन पर फिल्म बन रही है.

एक फिल्म बन रही है, 'सांड की आंख'. अनुराग कश्यप बना रहे हैं. इसमें लीड रोल में तापसी पन्नू और भूमि पेडनेकर हैं. दोनों एक्ट्रेस दो बुजुर्ग औरतों का रोल निभा रही हैं. उन औरतों का रोल जो शूटर हैं. यानी निशानेबाज हैं. इस फिल्म की शूटिंग अभी चल रही है. ये दिवाली पर रिलीज होगी. लेकिन अभी-अभी इसका एक पोस्टर रिलीज हुआ है. अनुराग कश्यप ने खुद ट्वीट करके पोस्टर रिवील किया है. ये रहा उनका ट्वीट-

 

इस फिल्म का नाम पहले 'वुमनिया' रखा जा रहा था, लेकिन बाद में बदल दिया गया. दरअसल, फिल्मकार और निर्माता प्रीतिश नंदी ने दावा किया था कि 'वुमनिया' टाइटल उनका है, ऐसे में अगर इस टाइटल पर अनुराग फिल्म का नाम रखना चाहते हैं, तो उन्हें 1 करोड़ रुपए देने होंगे. जिसके कारण दोनों के बीच ट्विटर पर लंबी बहस भी हुई थी. इसके बाद अनुराग ने फिल्म का नाम बदलकर 'सांड की आंख' रख लिया था.

'सांड की आंख' दो बुजुर्ग औरतों की असल कहानी है. फिल्म में तापसी और भूमि देवरानी-जेठानी बनी हैं. आपस में लड़ने-झगड़ने वाली नहीं, बल्कि साथ मिलकर गोलियां चलाने वाली देवरानी-जेठानी बनी हैं. फिल्म की शूटिंग उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के छोटे से गांव जौहड़ी में हो रही है.

40244721_1466299093514149_2890634262904569856_n_750x500_013019050855.jpgतापसी पन्नू और भूमि पेडनेकर. फोटो- ट्विटर

आप सोच रहे होंगे कि जौहड़ी गांव में शूटिंग क्यों? अरे भई, क्योंकि इसी गांव में तो रहती हैं हमारी और आपकी 'शूटर दादियां'. यानी गोली दागने वाली देवरानी-जेठानी की झक्कास जोड़ी. फिल्म जब आएगी, तब आएगी, लेकिन हम आपको अभी, इसी वक्त दोनों दादियों से मिलवाएंगे-

चंद्रो तोमर 84 साल की हैं. जौहड़ी गांव में रहती हैं. बहुत धाकड़ महिला हैं. निशानेबाज हैं. ढेर सारे मेडल जीत चुकी हैं. इनका घर मेडल्स से पटा पड़ा है. जिस उम्र में लोग बिस्तर पर पैर पसारकर, पुराने दिनों की यादों में खोए रहते हैं, उस उम्र में चंद्रो लड़कियों को शूटिंग यानी निशानेबाज़ी सिखाती हैं. गांव वाले इन्हें कहते हैं, 'शूटर दादी'.

b1665f00-ad5d-4041-b3cb-a2273c4d60b1_750x500_013019051006.jpgशूटर दादी चंद्रो (लेफ्ट), प्रकाशी (राइट). फोटो- स्पेशल अरैंजमेंट

जानिए 'शूटर दादी' की कहानी-

शूटर दादी चंद्रो की पोती का नाम है शेफाली तोमर. आज से करीब 19 साल पहले, जब शेफाली 11 साल की थीं, तब वो निशानेबाज़ी सीखने के लिए रेंज पर गईं. दादी चंद्रो भी शेफाली के साथ गईं. उस वक्त दादी 65 साल की थीं. शेफाली को रेंज पर गन देखकर डर लगा. शेफाली की हिम्मत बढ़ाने के लिए चंद्रो ने गन उठाई. और गोले पर निशाना लगा दिया, पहला निशाना ही सीधा जाकर 10 नंबर पर लगा. यानी एकदम बीचोंबीच लगा.

38101564-4f65-478c-bdc0-6b09a6bdc4ea_750x500_013019051030.jpgशूटर दादी चंद्रो तोमर. फोटो- स्पेशल अरैंजमेंट

एक इंटरव्यू में चंद्रो कहती हैं, 'जब शेफाली रेंज पर डर गई, तब मैं उठकर उसके पास गई. कोच के सामने मैंने गन लोड की. शेफाली के हाथ में देने से पहले मैंने सोचा कि एक बार मैं खुद ही चलाकर देखती हूं. मेरा पहला छर्रा ठीक जगह लग गया. ये देखकर मेरी पोती का साहस बढ़ा. उसने भी गन चलाई, उसका निशाना भी ठीक लगा. उसे देखकर मेरा साहस बढ़ा.'

shooter-dadi_750x500-1_013019051416.jpgशूटर दादी चंद्रो तोमर. फोटो- स्पेशल अरैंजमेंट

ये सबकुछ, उस वक्त रेंज पर मौजूद कोच देख रहे थे. उन्होंने चंद्रो को दोबारा निशाना लगाने को कहा. चंद्रो का निशाना दूसरी बार भी सटीक रहा. एकदम गोले के बीचोंबीच लगा. दादी के शानदारी निशानेबाज़ी देखने के बाद, वहां उस वक्त जो बच्चे मौजूद थे, वो कहने लगे, 'दादी खेल, दादी खेल.'

पानी का जग घंटे भर थामकर प्रैक्टिस-

दादी चंद्रो हरियाणवी फैमिली से आती थीं. बड़ा परिवार था. उन्हें पता था कि उनकी फैमिली के मर्द उन्हें सपोर्ट नहीं करेंगे. रोक-टोक लगाई जाएगी. ये डर भी लगा कि अगर शूटिंग करना शुरू कर दी, तो समाज क्या कहेगा.गांव के लोग क्या कहेंगे. इसलिए शुरुआत में दादी चंद्रो ने छिपते-छिपाते रेंज पर जाना शुरू किया. अब गन भारी होती है, एक हाथ को सीधा रखकर गन पकड़ना होता है. इसके लिए हाथों में पावर होना चाहिए, बैलेंस बनाते आना चाहिए. हाथों की ताकत और बैलेंस बढ़ाने के लिए दादी ने एक जुगाड़ निकाला. घर पर सबकी नजरों से छिपते हुए दादी एक जग में पानी भर लेतीं, और फिर उसे सीधा पकड़कर करीब एक घंटे तक खड़ी रहतीं. ऐसा वो अधिकतर रात में सबके सोने के बाद करती थीं, ताकि किसी की नजर न पड़े.

medals_750x500_013019051431.jpgदादियों के मेडल्स. फोटो- स्पेशल अरैंजमेंट

दादी अपनी बोली में कहती हैं, 'मुंह में राम, हाथ में काम... सुबई जाऊं, छर्रा मारूं, टेन में लगे.' फिर क्या एक तरफ दादी प्रैक्टिस करती रहीं, दूसरी तरफ कॉम्पिटिशन्स में भी पार्ट लेने लगीं. पहले कॉम्पिटिशन में दादी ने जीता सिल्वर मेडल. अखबार में तस्वीरें छपीं. घरवाले देख न सकें, इसलिए दादी ने अखबार ही छिपा लिया. लेकिन बाद में हिम्मत करके दादी ने अखबार दिखा दिया. और फिर शूटर दादी का वो बेहद प्यारा सा भेद उनके परिवार के सामने खुल गया, गांव के सामने खुल गया.

dadi-11_750x500_013019051459.jpgशूटर दादी चंद्रो (लेफ्ट), प्रकाशी (राइट). फोटो- स्पेशल अरैंजमेंट

शुरू में लोगों ने ताने कसे. गांववाले कहते, 'पोता-पोती खिलाने की उम्र में ये क्या कर रही हो.... आर्मी में जाने का इरादा है क्या...' लेकिन लोगों के तानों से दादी चंद्रो रुकी नहीं. इन बातों पर ध्यान ही नहीं दिया और अपना काम करती रहीं. धीरे-धीरे परिवार वाले भी इस सच्चाई के साथ सहज हो गए, कि चंद्रो शूटर दादी हैं.

फिर हुई देवरानी प्रकाशी की एंट्री-

प्रकाशी, दादी चंद्रो की देवरानी हैं. ये भी शूटर हैं. कमाल की शूटर हैं. जेठानी को शूटिंग करता देख, इन्हें भी प्रेरणा मिली. ये भी रेंज पर जाने लगीं, निशानेबाज़ी करने. जग वाला फंडा दादी प्रकाशी ने भी अपनाया. बैलेंस बनाने के लिए रात में टाइम निकालकर जग पकड़कर खड़ी हो जातीं. प्रकाशी कहती हैं, 'लगन और हिम्मत के आगे, उम्र कोई चीज ही नहीं है. लगन, हिम्मत इतनी करी कि बुढ़ापा चला गया और जवानी आ गई.' वहीं शूटर दादी चंद्रो कहती हैं, 'शरीर बूढ़ा होता है, मन नहीं.'

dadi-6_750x500_013019051535.jpgशूटर दादी प्रकाशी. फोटो- स्पेशल अरैंजमेंट

शूटर दादियां अब पिछले करीब 18-19 सालों से निशानेबाज़ी कर रही हैं. कई सारे कॉम्पिटिशन्स में हिस्सा ले चुकी हैं. ढेर सारे मेडल भी जीत लिए हैं. जौहड़ी गांव में लड़कियों को निशानेबाज़ी भी सिखाती हैं. ऐसा नहीं है कि ये दोनों पूरे समय रेंज पर ही रहती हैं, बल्कि ये दोनों घर का भी काम करती हैं. घर और बाहर, दोनों ही कामों में एक्सपर्ट हैं शूटर दादियां.

dadi-7_750x500_013019051624.jpgशूटर दादी प्रकाशी. फोटो- स्पेशल अरैंजमेंट

हमने शूटर दादी चंद्रो के एक करीबी रिश्तेदार से बात की. उन्होंने हमें बताया कि निशानेबाज़ी करने के पीछे दादी का मकसद, पुरुष प्रधान समाज में लड़कियों को बराबरी का हक दिलाना है. वो चाहती हैं कि लड़कियां भी आगे बढ़ें. वो चाहती हैं कि गांव की लड़कियां उन्हें देखकर प्रेरणा लें, और अपने पैरों पर खड़ी हो जाएं. सिर उठाकर जीना सीखें.

ख़ुशी की बात ये कि इस फिल्म के बनने के बाद इनकी कहानी और ज़्यादा लोगों तक पहुंचेगी.

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