मिलिए उस भीमकाय पंजों वाली लड़की से जो चूड़ीदार और सलवार के नीचे स्पोर्ट्स शूज़ डालती है

मैं अपनी चप्पल नहीं चुनती. बल्कि चप्पल मुझे चुनती है.

लालिमा लालिमा
मई 31, 2019

ये ब्लॉग उस लड़की का है जिसकी हाइट 5 फुट 9 इंच है, जिसका नाम चंचल (नाम बदल दिया गया है) और जिसे अपने पैर के पंजे के साइज की चप्पल नहीं मिलती है.

मेरी रूममेट इस वजह से परेशान है कि उसका बॉयफ्रेंड उससे ठीक से बात नहीं करता. मेरे रूम के बगल में रहने वाली लड़की इसलिए परेशान है, क्योंकि उसका वजन बहुत कम है. मेरी मकान मालकिन, जो मेरे उम्र की ही है, वो इस कारण परेशान है कि वो जिस लड़के को पसंद करती है, वो उससे 9 साल बड़ा है. You know generation gap, बड़ी दिक्कत होती है. जितने लोग, उतनी परेशानी.

अब मैं हूं 26 साल की, मेरी भी एक दिक्कत है. नहीं-नहीं बॉयफ्रेंड वाली, वजन वाली, या बड़े उम्र के लड़के वाली नहीं. मेरी दिक्कत है मेरी चप्पलें. जो मिलती ही नहीं हैं. दिल्ली में रह रही हूं 5 साल से. कई सारी दुकानें छान मारी हैं. लेकिन जहां भी जाती हूं, वहां से मुंह लटकाकर ही लौटती हूं.

मेरी हाइट है 5 फुट 9 इंच. अब हाइट के हिसाब से मेरे पैर के पंजे का साइज भी काफी ज्यादा है. काफी ज्यादा मतलब काफी ज्यादा. इतना ज्यादा कि लड़कियों वाली चप्पलें तो मुझे मिलती ही नहीं हैं. यूरो में मेरे पैर का साइज है 43. चौंक गए? कोई बात नहीं, नॉर्मल है आपका चौंकना. चप्पल की दुकान वाले भी मेरे पंजे देखकर रुआंसे से हो जाते हैं. अरे भई, उनका एक ग्राहक बिना चप्पलें लिए चला जाएगा न, ये सोचकर. उस वक्त उनकी शक्ल देखकर बड़ा तरस आता है. वैसे तो मुझे अपने पंजों पर भी तरस आता है, क्योंकि उन्हें सुंदर-सुंदर चप्पलें नसीब नहीं होती हैं. बेचारे लड़कों वाले स्पोर्ट्स शूज से ही काम चलाते हैं.

chappal-3_750_060119120028.jpgदिल्ली के सरोजनी नगर मार्केट में चप्पलों की ढेर दुकानें हैं. वहां कम दाम में लड़कियों की सुंदर-सुंदर चप्पलें और सैंडल्स मिलती हैं. लेकिन मेरे लिए वहां भी कुछ नहीं है. फोटो- वीडियो स्क्रीनशॉट

अब हुआ ये कि जब छोटी थी, तब उम्र के हिसाब से मेरी हाइट ज्यादा थी. पैर के पंजों का साइज भी बढ़ रहा था. मम्मी बड़ी परेशान. सोचतीं, 'अभी तो चप्पलें और बेलीज़ मिल जाती हैं, लेकिन जब ये बड़ी होगी, तो क्या करेगी. इसी सुपरफास्ट ट्रेन की स्पीड से अगर इसके पंजों का साइज बढ़ता गया, तो ऐसा न हो कि शादी के दिन लहंगे के नीचे भी इसे स्पोर्ट्स शूज़ पहनने पड़ें.' (ये मेरी मम्मी की सोच है)

खैर, अब पंजों का साइज तो बढ़ गया. दिक्कत तब आनी शुरू हो गई, जब मैं 18 साल की हुई. क्योंकि उसके पहले तक तो कैसे भी करके मेरे पंजों के साइज की लड़कियों वाली चप्पलें मिल जाती थीं, लेकिन उसके बाद तो चप्पल खोजने में नानी याद आने लगी. दस दुकानों में चक्कर काटती हूं, तब कहीं जाकर एक चप्पल मुझे मिलती है. वो भी काम चलाऊ. मेरे पास तो दुकानदार को ये कहने का भी ऑप्शन नहीं होता कि 'भैया, कोई दूसरा कलर है क्या'. कैसे कहूं, मुझे पता है न कि उसके पास नहीं है.

अब आपको बताती हूं कि जब मैं चप्पल खरीदने जाती हूं तो क्या-क्या होता है. पहला तो ऑनलाइन शॉपिंग का ऑप्शन नहीं है मेरे पास. क्योंकि उनके साइज चार्ट में तो 41 के आगे के नंबर ही गायब रहते हैं. तो ये ऑप्शन कैंसिल. अब आता है दूसरा ऑप्शन. दुकान दर दुकान भटकने का ऑप्शन. पूरा एक दिन का टाइम निकालना पड़ता है. मतलब एक छुट्टी बेकार, या यूं कह लें कि मैं वो छुट्टी अपनी लाइफ के सबसे जरूरी काम को 'समर्पित' कर देती हूं.

chappal-2_750_060119120142.jpgऐसी चप्पल पहनने के लिए मुझे अगला जन्म लेना होगा, वो भी छोटे पंजों के साथ. फोटो- वीडियो स्क्रीनशॉट

चप्पलों की दुकान में घुसने के साथ ही मैं कहती हूं, 'भैया बड़े साइज़ की चप्पलें हैं क्या?' भैया जी बड़े विश्वास के साथ कहते हैं, 'अरे मैडम, एक से बढ़कर एक साइज की चप्पलें हैं.' फिर मैं थोड़ा मुस्कुराती हूं. मन में सोचती हूं कि 'बेट्टा अभी पता चल जाएगा. हूंह्ह्ह'

फिर दुकान वाले भैया मेरा पैर देखते हैं. उनका विश्वास मुझे चकनाचूर होता दिख जाता है. फिर वो जैसे-तैसे खुद को संभालते हैं. कहते हैं 'कोशिश करते हैं मैडम'. फिर वो अंदर जाते हैं, बहुत-बहुत-बहुत देर बाद वापस आते हैं. मैं मन में सोचती हूं कि जरूर वो अपनी खदान से ढेर सारी चप्पलें निकालकर ला रहे होंगे. लेकिन 'खोदा खदान निकली चुहिया' वाली बात होती है. (जानती हूं पहाड़ खोदा जाता है, लेकिन मैंने खदान लिखा है. मेरी मर्जी). फिर भैयाजी आते हैं. लेकिन उनके हाथ में होती है दो या तीन जोड़ी चप्पलें. तीनों बक्से से निकालते हैं, मेरे पैर में डालते हैं. लेकिन बूमममम... तीनों छोटी पड़ जाती हैं. फिर भैयाजी अंदर जाते हैं. मैं इंतजार करती हूं. थोड़ी देर बाद देखती हूं कि वो भैया किसी दूसरी मैडम के पैर में चप्पलें पहना रहे होते हैं. मैं पूछती हूं कि 'भैया आप तो मेरे लिए चप्पलें लाने गए थे न?' भैया जी लाचार सी नजरों से देखते हैं, कहते हैं, 'सॉरी मैडम, आपके पैर के लिए हमारे पास चप्पलें नहीं हैं.' मैं मुंह लटकाकर वापस चली जाती हूं.

shoes-3_060119120309.jpgलड़कों के पंजों के साइज़ के स्पोर्ट्स शूज़ मेरे जीवन का सहारा बन चुके हैं.

ऐसा मेरे साथ कई बार हो चुका है. कई बार तो दुकान में काम करने वाला कोई भी बंदा मुझे अटेंड करने आता ही नहीं. वो मेरे पंजे देखकर ही डर जाते हैं. कहते हैं 'मैडम लड़कों वाले स्पोर्ट्स शूज़ ले लीजिए. वो आ जाएंगे, अच्छे भी दिखेंगे.' पता है ये बात सुनकर मेरे मन में क्या आता है, 'अबे ..., लड़कों वाले स्पोर्ट्स शूज़ तो मुझे ऑनलाइन भी मिल जाते. अगर वही लेना होता तो तेरी दुकान में मैं क्यों आती.' लेकिन ये बात मैं बोलती नहीं हूं, मन में ही रखती हूं. 'ठीक है भैया, कोई बात नहीं' बोलकर मैं चली जाती हूं.

फिर 10-12 दुकान देखने के बाद एक चप्पल मुझे चुनती है. 'हैरी पॉटर' देखी है? उसमें हर जादुई छड़ी अपना मालिक खुद चुनती है, क्योंकि वो छड़ी उसी पर्टिकुलर इंसान के लिए बनी होती है. वैसे ही वो चप्पल मेरे लिए बनी रहती है, इसलिए मैंने यहां ये लिखा कि चप्पल ने मुझे चुना.

harry-potter-1_060119120407.jpgहैरी पॉटर के फर्स्ट पार्ट का वो सीन जहां जादुई छड़ी हैरी को अपने मालिक के तौर पर चुनती है.

देखिए, मुझे जीन्स पहनना अच्छा लगता है. काफी कंफर्टेबल लगता है. लेकिन गर्मी में कर्ता-लेगिंग्स पहनना भी अच्छा लगता है. वैसे तो सारी सर्दी में जीन्स के नीचे स्पोर्ट्स शूज़ पहनकर निकाल लेती हूं. लेकिन गर्मियों में लेगिंग्स के नीचे स्पोर्ट्स शूज़ पहनना???? मतलब सीरियसली?? यार लड़कियों वाली सुंदर-सुंदर चप्पलें पहनने का हक मुझे भी है. लेकिन... अब छोड़ दीजिए. कुछ नहीं हो सकता. लोग बड़े पंजों वाली लड़कियों की तरफ तो ध्यान ही नहीं देते हैं.

चप्पल बनाने वालों को ये लगता है कि बड़े पंजे तो केवल लड़कों के हो सकते हैं, लड़कियां तो छोटे-छोटे, नन्हे-नन्हे पंजों वाली ही होंगी. तो उनके लिए क्यों जबरन बड़े पंजों वाली चप्पलें, बैलीज़ और सैंडल्स बनाई जाए.

मुझे कई बारी तो सलवार सूट के नीचे भी स्पोर्ट्स शूज़ पहनने पड़ जाते हैं. ऑफिस भी मैं ऐसे ही जाती हूं कई बार. हंसने वाले हंसते हैं. पहले फर्क पड़ता था, अब नहीं.

एक और बात, वो जो सेल लगी होती है न दुकानों में 200 रुपए में कोई भी चप्पल ले लो, 300 रुपए में चप्पल ले लो (लड़कियों वाली), वो सेल मेरे लिए नहीं है. अपना तो उन सेल की तरफ देखना भी पाप है. छोटे पंजे वाली लड़कियों को देखकर लगता है कि अपने पैर का थोड़ा सा हिस्सा काटकर उन्हें दे दूं.

लोग कहते हैं ब्रांडेड दुकानों में जाओ, मिल जाएगी. मैं सच बताऊं, तो मैं बड़े नामों वाली दुकानों में भी जा चुकी हूं, कुछ नहीं मिलता. केवल दुकानदार के 'सॉरी मैडम' के अलावा.

चप्पलों की बात की जाए तो दुनिया में दो ही लड़कियां हुई हैं. एक सिंड्रेला और एक मैं. उसके नाप की चप्पल एक चमकीला राजकुमार लाया था. मेरे नाप की चप्पल स्वयं भगवान भी चाहें तो नहीं ला सकते.  

syndrela-1_060119120459.jpgसिंड्रेला का चमकीला राजकुमार उसे चमकीला और सुंदर जूता पहनाता है, और इस जूते को देख मेरे मन में लालच आ जाता है.

खैर, दुनिया में बहुत दिक्कतें हैं, मेरे पंजों के साइज़ की चप्पलें न मिलना कोई ज्यादा बड़ी दिक्कत नहीं है. रह लेंगे हम इस गम के साथ. अब तो आदत हो गई है सूट के नीचे स्पोर्ट्स शूज़ पहनने की. शादी वाले दिन भी लहंगे के नीचे लड़कों वाले जूते पहन लूंगी. कौन देखेगा??

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