मैं और 'छक्का'

उसके साथ बैठकर साबूदाने की खिचड़ी खाने के बाद बहुत कुछ बदल गया.

लालिमा लालिमा
जनवरी 31, 2019
प्रतीकात्मक तस्वीर. रॉयटर्स

'रामलीला', ये जो शब्द है न, मेरे लिए केवल चार अक्षरों का शब्द नहीं है, बल्कि मेरे बचपन का वो हिस्सा है जो सबसे खास है. अयोध्या की रामलीला के बारे में तो सब जानते हैं, लेकिन एक रामलीला मेरे शहर में भी होती है. जिसके बारे में केवल मेरे शहर वाले ही जानते हैं. हर साल होती है. दशहरे वाले दिन रावण के मौत के बाद खत्म होती है. ये रामलीला ज़रा भी पॉलिटिकल नहीं है. बल्कि बहुत सारी यादों और किस्सों का किस्सा है. इसी रामलीला से जुड़ा हुआ एक किस्सा मैं आप लोगों को बताना चाहती हूं, जो मेरे दिल के सबसे करीब है. जिसे मैं हमेशा याद रखूंगी.

उस वक्त मैं 8-9 साल की थी. मेरे घर के पास रामलीला का मंच था. हर साल वहां 13 दिन के लिए रामलीला होती थी. मेरा भी मन करता था उसमें हिस्सा लेने का. कई बार कोशिश भी की, लेकिन दो कारणों से रोल नहीं मिला. पहला- मेरी उम्र के लायक कोई रोल था ही नहीं. दूसरा- रामलीला में 'सीता' तक का रोल कोई लड़का ही करता था, लड़की नहीं. अब दूसरे कारण का विरोध करने की न तो हिम्मत मेरे अंदर उस वक्त थी, और न ही समझ. खैर, बाद में पता चला कि एक रोल है, जो मुझे मिल सकता है. रोल था सीता की सहेली बनने का. जिसे हम लोग सीता की सखी कहते थे.

raam-leela-750x500_013119054732.jpgरामलीला की तस्वीर. फोटो- वीडियो स्क्रीनशॉट

अब ये रोल मेरी जैसी कई सारी छोटी लड़कियों को मिला. करीब 15-20 लड़कियां तो रही ही होंगी. एक दिन का ही काम होता था सखियों का. स्वयंवर वाले दिन का. उस दिन 'सीता' बने लड़के के पीछे, सखियों को हाथ में कलश लेकर चलना होता था. अब भई, राम जी बिहाने आने वाले थे न, इसलिए सीता के साथ उसकी सखियों का होना तो जरूरी रहता ही. मैं भी सखी बनी. और मेरे साथ मेरी एक पक्की सहेली भी. बाकी जितने लड़के मेरे दोस्त थे, वो बाद में वानर सेना में शामिल हो गए.

raam-leela-1-750x500_013119054745.jpgरामलीला की तस्वीर. फोटो- वीडियो स्क्रीनशॉट

मम्मी ने बढ़िया से सजा-धजा कर पहुंचा दिया रामलीला के उस मंच में. मंच एकदम चकाचक सजा हुआ था. स्वयंवर के लिए मंच पर बना राजमहल तैयार हो गया था. राजमहल की रौनक बढ़ाने के लिए, और स्वयंवर के जश्न को मनाने के लिए गाने भी बजाए जाते थे, और डांस भी होता था. डांस करती थी 'रेशमा'. वो 'छक्का' थी. (यहां छक्का इसलिए लिख रही हूं, क्योंकि हमारे साइड उन्हें यही कहा जाता है. किसी की भावना को ठेस पहुंचाने का मेरा कोई मकसद नहीं है).

rtr3cfg5-750x500_013119054800.jpgप्रतीकात्मक तस्वीर. रॉयटर्स

हम सब 'सीता' बने लड़के के पीछे खड़ी हुई थीं. रेशमा का डांस देख रही थीं. बहुत अच्छे से उसने अपनी परफॉर्मेंस दिया. जैसे ही उसका डांस खत्म हुआ, मुझे उससे मिलने की इच्छा हुई. मेरे लिए किसी 'छक्के' से मिलकर बात करना, बहुत अनोखी बात थी. क्योंकि, हमारे यहां 'उन्हें' बहुत अलग नजर से देखा जाता है. उनसे दूर रहने की हिदायत दी जाती है. खैर, मेरे घर में ऐसा कुछ नहीं था. मम्मी-पापा ने कभी इस तरह की कोई बात नहीं कही थी. बस दादी कभी-कभार कह देती थीं. लेकिन फिर मोहल्ले के दूसरे लोग तो होते ही हैं, जो आपको ऐसी बाते बता देते हैं, जिनके बारे में आप अपने दिमाग से कभी सोच भी नहीं सकते.

वापस आते हैं रेशमा पर. वो डांस खत्म करके जा चुकी थी. और आधा स्वयंवर भी हो चुका था. हमारा काम भी खत्म हो चुका था. वैसे तो कोई काम था नहीं, बस वही था कलश लेकर खड़े रहना था. वो काम भी हो गया था. हम लोग मंच के पीछे बने हॉल में चले गए. उस हॉल में ही सभी कलाकार तैयार होते थे. आप उसे कलाकारों का 'ड्रेसिंग रूम' की तरह समझ सकते हैं. लेकिन उस बड़े से हॉल में कलाकारों को तैयार करने के अलावा, नाश्ता-पानी भी होता था. सबको नाश्ता मिलता था, और चाय भी.

rtr326kg-750x500_013119054812.jpgप्रतीकात्मक तस्वीर. रॉयटर्स

स्वयंवर वाले दिन, साबूदाने की खिचड़ी बनी थी. हम सब 'सखियों' को भी खिचड़ी मिली. बैठने की कोई जगह नहीं थी हॉल में. कहीं 'राम' का मेकअप हो रहा था, तो कहीं 'रावण' का, तो कहीं 'सीता' का. तो कहीं ढेर सारा सामान रखा हुआ था. अब ऐसे में हम 'सखियों' को जहां जगह मिली, वहां बैठ गए. मुझे और मेरी पक्की सहेली, को रेशमा के पास थोड़ी जगह दिखी. जो उस वक्त जमीन पर बिछी दरी में बैठकर साबूदाने की खिचड़ी खा रही थी. मेरा तो मन था ही उससे बात करने का, मैंने मेरी पक्की सहेली से कहा कि हमें उसके पास जाकर बैठना चाहिए. वो भी मान गई. हमने खिचड़ी का दोना अपने हाथ में उठाया, और उसके पास जाकर बैठ गए.

rts2bf38-750x500_013119054854.jpgप्रतीकात्मक तस्वीर. रॉयटर्स

पहली बार मैं किसी 'छक्के' के बगल में बैठी थी. अभी तक जब भी देखा था 'उन्हें', दूर से ही देखा था. हम लोग चुपचाप खिचड़ी खाने लगे. हम लोग मतलब मैं और मेरी पक्की सहेली. रेशमा हम से उम्र में कुछ नहीं तो 12-15 साल बड़ी तो रही ही होगी. मैं और मेरी पक्की सहेली एक-दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुरा तो रहे ही थे, लेकिन कहीं न कहीं थोड़ा डर भी लग रहा था. हमें लग रहा था कि हम कोई बहुत बड़ा और अनोखा काम कर रहे थे. हमारे चेहरे के भाव रेशमा ने देख लिए. मैंने धीरे से सिर उठाकर उसकी तरफ देखा. वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई, मेरी पक्की सहेली की तरफ देखकर भी रेशमा ने स्माइल की. उसके ऐसा करने के बाद, मैं और मेरी पक्की सहेली, थोड़ा सहज हुए.

rtx6k2yd-750x500_013119054823.jpgप्रतीकात्मक तस्वीर. रॉयटर्स

फिर रेशमा ने एक-एक कर हम दोनों का नाम पूछा. हमने नाम बताया. फिर वही सारे सवाल पूछे, जो दूर के रिश्तेदार पहली बार मिलने पर पूछते हैं. जैसे- कौन सी क्लास में पढ़ते हो. कौन से स्कूल में पढ़ते हो. घर कहां है. यही सार सवाल. रेशमा ने भी हमसे पूछे. हमने सभी के जवाब दिए. रेशमा ने हमसे हमारी हॉबी के बारे में सवाल किया. हम लोग दिनभर क्या करते हैं, ये भी पूछा. अपने डांस के बारे में भी बहुत सारी बातें बताई. शाहरुख खान और सलमान खान की भी बातें की हमने. स्कूल में होने वाली प्रार्थना भी हम दोनों ने रेशमा को सुना डाली. हम तीनों ने बहुत बातें की. रेशमा ने हमें बहुत, बहुत, बहुत हंसाया.

मैं अंदर से बहुत खुश थी. मुझे खुशी इस बात की थी कि मैं पहली बार किसी 'छक्के' से बात कर रही थी. मुझे खुशी इस बात की थी कि मैंने उस इंसान से बात की थी, जिसका डांस मुझे बहुत पसंद था. मैं खुश थी, क्योंकि मुझे ये पता चल गया था कि रेशमा मेरे और मेरी पक्की सहेली, जैसी ही थी. उसे भी शाहरुख खान पसंद था. उसे भी फिल्में देखना पसंद था. उसे भी लोगों से बातें करना अच्छा लगता था.

rtr4oup2-750x500_013119054839.jpgप्रतीकात्मक तस्वीर. रॉयटर्स

हॉल बंद होने का टाइम हो गया था. सीता और राम की शादी हो गई थी. उस दिन की रामलीला हो चुकी थी. मैं और मेरी पक्की सहेली के पापा आ गए थे, हमें लेने. मैं उठी और मैंने पलटकर रेशमा की तरफ देखा. मैंने उसे बाय कहा. उसने मुझसे कहा, 'खूब पढ़ना और आगे बढ़ना'. मैंने स्माइल की, और दौड़कर अपने पापा के पास चली गई. फिर पापा मुझे घर लेकर चले गए. मैं घर तो गई, लेकिन मेरी एक सोच तब तक बदल चुकी थी. रामलीला के उस स्वयंवर ने, साबूदाने की उस खिचड़ी ने, रेशमा ने, इन सबने मुझे बता दिया था कि लड़का या लड़की या कुछ और होने से पहले, हर कोई एक इंसान होता है.

इसे भी पढ़ें- 80 पार की ये दोनों दादियां इतनी तगड़ी शूटर हैं कि अनुराग कश्यप उन पर फिल्म बना रहे हैं

 

लगातार ऑडनारी खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करे      

Copyright © 2019 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today. India Today Group