मुबारक हो, मोदी समर्थकों ने इस बार घटियापन का चरम छू लिया है

मोदी समर्थकों की इन घटिया बातों से खुद मोदी घिना जाएं

ट्रोल-  (संज्ञा). (नपुंसकलिंग): एक ऐसा व्यक्ति जो जानबूझकर उकसाने के लिए बेहूदे ऑनलाइन पोस्ट करे.

उदाहरण:  

वो जो किसी औरत को ‘रंडी’ बुलाए.

वो जो किसी औरत को उसके औरत होने पर बेइज्जत करे.

वो जो एक औरत के शरीर को हथियार बना ले. और उसी के खिलाफ इस्तेमाल करे.

वो जो मां और बहन को इज्जत देने की आड़ में मां और बहन के शरीर को तहस-नहस करने वाली गालियां दे.

वो जो भारत माता का लाल होने का दावा करे. और किसी और की माता को अपनी सेक्स स्लेव बनाने की धमकी दे.

वो जो एक नेता की तस्वीर इसलिए शेयर करे, क्योंकि उस औरत के पास स्तन हैं. उन स्तनों को मापा जा सकता है. उनकी खिल्ली उड़ाई जा सकती है.

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तस्वीर: ट्विटर

क्योंकि

राजनीति में उतरने वाली एक जवान औरत के शरीर पर स्तन हैं. और ट्रोल अपनी नज़र वहां से नहीं हटा पा रहे हैं.

प्रियंका गांधी कांग्रेस के भाई-भतीजावाद का लेटेस्ट उदाहरण हो सकती हैं. प्रियंका गांधी अपनी दादी इंदिरा गांधी की छवि भुनाने के लिए उतारी गई कैंडिडेट हो सकती हैं. प्रियंका गांधी को राजनीति की समझ कितनी है और वो कितना काम कर सकती हैं, इसका कोई आईडिया किसी को नहीं है. इस पर बहस हो सकती है.

yanka-0_020119012418.jpgतस्वीर: ट्विटर

जो नहीं हो सकता वो ये कि प्रियंका गांधी के औरत होने की वजह से उनका शरीर उनकी पॉलिटिक्स से ऊपर रखा जाए.

उसकी खिल्ली उड़ाई जाए.

उसे ललचाने की चीज माना जाए.

yanka-7_020119013538.jpgतस्वीर: फेसबुक

ये कहा जाए कि एक औरत वोटरों को अपने शरीर से आकर्षित करके उनका वोट जीत सकती है.

ट्विटर और फेसबुक पर हर जगह प्रियंका गांधी की इस फोटो के साथ ये पोस्ट चल रहे हैं. इनका टेक्स्ट यही है हर जगह:

yanka-4_020119012503.jpgतस्वीर: ट्विटर

वो तुम्हें 28-28 इंच के दो दिखा कर ललचाने की कोशिश करेंगे. तुम 56 इंच पर अड़े रहना.

राजनीति में आने का मतलब कीचड़ में उतरना इतना एक्यूरेट पहले कभी नहीं लगा. जितना अभी लग रहा है. ट्रोल्स जो कोनों में थे, वहां से खुचड़ निकाल रहे थे. रेंगते हुए बाहर निकल आए हैं. इन्हें डर नहीं है. किसी भी चीज का. कोई डेफिनिशन नहीं है, मोरालिटी की. पर हम क्यों ही बोल रहे हैं. क्यों लकीर पीट रहे हैं? कुछ हुआ तो है नहीं इससे क्या फायदा है. लोग फिर भी विष्ठावमन करने से बाज थोड़े ही आएंगे. ये पढ़कर सुधरना तो है नहीं उनको.

लेकिन हम फिर भी लिखेंगे.

और तब तक लिखते रहेंगे जब तक शर्म खुद उठ कर इनके मुंह पर थप्पड़ नहीं मार देती.

 

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