मद्रास हाईकोर्ट के जज ने ऐसी बात कह दी है कि सिर भन्ना जाएगा

'नैतिक शिक्षा' के नाम पर अपने मन की नफरत जाहिर कर दी

उमा मिश्रा उमा मिश्रा
अगस्त 17, 2019
मद्रास हाईकोर्ट और जस्टिस एस विद्यानाथन.

एक यौन उत्पीड़न के मामले पर मद्रास हाईकोर्ट में सुनवाई हो रही थी. इसी बीच जज ने एक अजीबो-गरीब बात कह दी. कोर्ट का कहना है कि क्रिश्चियन इंस्टीट्यूट लड़कियों के भविष्य के लिए अनसेफ यानी असुरक्षित होते हैं. उनके मुताबिक़ ये धारणा पेरेंट्स के बीच भी आम है.

ये सोच जस्टिस एस वैद्यनाथन की है. इन्होंने सुनवाई के दौरान कहा कि स्कूल की छात्राओं के पेरेंट्स को ऐसा लगता है कि क्रिश्चियन इंस्टीट्यूट में पढ़ाना उनके बच्चों के लिए बहुत ज्यादा अनसेफ है. क्रिश्चियन इंस्टीट्यूट अच्छी शिक्षा तो देते हैं, पर उनकी नैतिक शिक्षा यानी मॉरल एजुकेशन पर सवाल बना रहता है.

court_081719035117.jpgजस्टिस एस विद्यानाथन.

अब ये बात क्यों कही, ये भी जानिए-

दरअसल, मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज के एक प्रोफेसर हैं सैम्युअल टेनीसन. इन पर 34 छात्राओं ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. ये उत्पीड़न कथित तौर पर एक स्कूल पिकनिक (Tour) के दौरान हुआ था. सैम्युअल पर आरोप लगने के बाद कॉलेज की जांच कमेटी मामले की जांच कर रही थी.

24 मई 2019 को आरोपी के खिलाफ कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया था. उसी को खारिज करने के लिए आरोपी प्रोफेसर ने कोर्ट में याचिका दायर की थी. पर कोर्ट ने इस मामले में दखल करने से मना कर दिया. ये कहा कि ईसाई मिशनरी समूह किसी न किसी मामले को लेकर सवालों के घेरे में रहता है..

पीटीआई के अनुसार जज का कहना है कि को-एड शिक्षा बच्चों के लिए सही नहीं है. आज के समय में क्रिश्चियन इंस्टीट्यूट पर दूसरे धर्मों के लोगों पर जबरन ईसाई धर्म अपनाने के आरोप भी लगे हैं. इतना ही नहीं, जज का कहना है कि महिलाओं की रक्षा के लिए कई कानून बनाए गए हैं, जिसका गलत इस्तेमाल किया जाता है. अब समय आ गया है कि पुरुषों के लिए भी कानून बनाए जाएं या कानून में संशोधन किया जाए, जिससे निर्दोष पुरुषों की रक्षा की जा सके.

madras_081719035153.jpgमद्रास हाईकोर्ट.

तो ये सारी बातें एक हाईकोर्ट के जज कह रहे हैं. उन्होंने आरोपी के खिलाफ कुछ न कहकर सीधे स्कूल पर ही ठीकरा फोड़ दिया. कोई भी बच्चा या बच्ची स्कूल में अनसेफ नहीं होते, जब तक स्कूल से किसी गलत बात को संरक्षण न मिला हो. 

यौन उत्पीड़न या बच्चों के शोषण के मामले कई स्कूलों से सुनाई देते हैं. उसमें भी स्कूल का टीचर या स्टाफ ही शामिल होता है. उन पर भी मामले दर्ज होते हैं. पर उन स्कूलों को भी इस तरह काउंटर नहीं किया जाता, जिस तरह के तर्क देकर जज ने इस बार ने किया है. ये एक छुपे हुए बायस का प्रतीक है. जो शायद इस बार छुपा न रह सका.

कानून का गलत इस्तेमाल होता है या सही, ये जांच-पड़ताल के बाद ही मालूम होता है. कई दिनों तक मामला कोर्ट में चलता है. उसके बाद ही सजा सुनाई जाती है. पुरुषों के हक में कानून बनाना कोई गलत बात नहीं, पर एक यौन उत्पीड़न के केस की सुनवाई के दौरान इस तरह की बातें करके शायद जज आरोपी को एक तरह से सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं. और उन 34 लड़कियों को गलत. जिनसे लोगों को न्याय की उम्मीद है, वो ही इस तरह के कुतर्क दे रहे हैं. 

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