फिल्म 'कबीर सिंह' की मेकिंग से जुड़े हर इंसान के लिए एक मैसेज, जो हो गया सो हो गया, अब आगे बढ़ें

हाल के एक इंटरव्यू में शाहिद कपूर ने माना कि उन्हें भी 'कबीर सिंह' के कैरेक्टर से दिक्कत है.

नेहा कश्यप नेहा कश्यप
जुलाई 26, 2019
शाहिद कपूर

'कबीर सिंह' रिलीज हो गई. हिट भी हो गई. स्टारकास्ट और डायरेक्टर खुश हैं. फिल्म की सक्सेस को लेकर सोशल मीडिया पर इमोशनल लेटर वगैरह शेयर हो चुके हैं. लेकिन इंटरव्यू अब भी चल रहे हैं. हाल ही में शाहिद कपूर ने एक इंटरव्यू दिया, जहां उन्होंने 'कबीर सिंह' के कैरेक्टर को लेकर बात की.

पूरे देश के बाद आखिरकार शाहिद ने भी स्वीकार किया कि उन्हें 'कबीर सिंह' के कैरेक्टर से दिक्कत है. हिंदुस्तान टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में कहा,

'मैं इस बात से वाकिफ हूं कि लोगों को कबीर सिंह से दिक्कत है. और मैं उन्हें जायज़ भी मानता हूं. कबीर से मुझे भी दिक्कतें हैं. मैं कभी वैसे बिहेव नहीं करना चाहूंगा, जैसे कबीर सिंह का किरदार करता है. लेकिन मैं एक एक्टर हूं, जिसे वो किरदार निभाना था. हम हमेशा से ईमानदार थे. हमने फिल्म के शुरुआती प्रोमो से ही ये बताना शुरू कर दिया था कि ये दिक्कतों से भरे एक किरदार की काल्पनिक कहानी है.'

शाहिद कहते हैं कि 'ऐसी' फिल्म बनाने में कोई दिक्कत नहीं है. एग्री. ये भी मान लिया कि 'कबीर सिंह' दिक्कतों से भरे एक कैरेक्टर की काल्पनिक कहानी है. लेकिन क्या 'कबीर सिंह' जैसे दिक्कतों से भरे एक कैरेक्टर को फिल्म में हीरो की तरह दिखाना सही है? क्या दिक्कतों से भरे कैरेक्टर को हमेशा सही दिखाना ठीक है? उसके गुस्से, बदतमीजी और मारपीट को सुपर पावर की तरह दिखाया जाना सही है?

kabir-750x500_072619081340.jpg'कबीर सिंह' ने वर्ल्ड वाइड करीब 367.68 करोड़ रुपये का बिजनेस किया है.

वो कैरेक्टर जो गुस्सा आने किसी को जान से भी मार सकता है. बात-बात पर थप्पड़ मार देता है. घटिया बातें करता है. सेक्स के लिए धमकाता है. मरने के कगार तक नशा करता है. और फिल्म में हर ऐसी सिचुएशन को हीरोइज्म वाले अंदाज में दिखाया जाता है. लोग तालियां बजाते हैं. सीटी मारते हैं. दिक्कत उससे है.

दिक्कत ऐसे कैरेक्टर को पर्दे पर दिखाने के तरीके से है. दिक्कत उसे एक काल्पनिक कहानी में ही भगवान या सबके दुख हरने वाला बताने से है.

अब बात करते हैं 'ऐसी' फिल्में करने वाली बात की. स्टोरी-स्क्रिप्ट सुनते समय ही ये समझ आ जाता होगा कि फिल्म में कौन सा कैरेक्टर लीड है. कौन से साइड कैरेक्टर होंगे. कैरेक्टर्स की स्क्रीन पर टाइमिंग, स्पेस, प्रजेंटेशन का तरीका वगैरह भी डिस्कस हो ही जाता होगा. फिर शाहिद इस 'प्रॉब्लमेटिक कैरेक्टर' फिल्म को करने से मना कर सकते थे. या कम से कम उसे स्क्रीन पर पेश करने के तरीकों पर बात कर सकते थे. खैर.

priti-750x500_072619081457.jpg फिल्म में 'प्रीति सिक्का' 2019 में जी रही 'निर्जरा' लगती हैं, जो फिल्म 'तेरे नाम' में शोषण करने वाले हीरो को देवता समझती है.

शाहिद कपूर ये भी नोटिस करना भूल गए कि फिल्म में सिर्फ हीरो ही नहीं हीरोइन का कैरेक्टर भी प्रॉब्लमेटिक है. क्योंकि पूरी फिल्म में हीरोइन डरी-सहमी सी रहती है. मर्जी के बिना छुए जाने पर विरोध नहीं करती. बदसलूकी के लिए दो शब्द नहीं कह पाती है. सिर्फ रोती है और अपने होने पर सवाल करती है.

इसी इंटरव्यू में शाहिद ने कहा,

'ये अच्छी बात है कि उनकी फिल्म ने लोगों को बात करने का मौका दिया है. लोगों ने फिल्म और संदीप वांगा रेड्डी के थप्पड़ मारने वाले बयान पर इतनी मजबूती से इसलिए रिएक्ट किया, क्योंकि वो लोग कबीर सिंह और प्रीति सिक्का को एक रियल कपल मानने लगे थे, जो एक दूसरे के साथ ऐसे बिहेव करते हैं.'

यहां उन्होंने दो बातों को मिक्स कर दिया. पहला फिल्म के डायरेक्टर संदीप रेड्डी वांगा का बयान. दूसरा कबीर सिंह के कैरेक्टर को लेकर लोगों के गुस्सा.

shahid-750x500_072619082550.jpgकबीर सिंह की सक्सेस पर कियारा ने एक सोशल मीडिया पर पोस्ट में कबीर और प्रीति की प्रेम कहानी में विश्वास के लिये फिल्म डायरेक्टर संदीप, एक्टर शाहिद और दर्शकों को शुक्रिया कहा था.

पहली बात तो कबीर और प्रीति जैसे कपल रियल नहीं होते. और अगर होते हैं, तो वो रिलेशनशिप में मौजूद प्रेमी-प्रेमिका नहीं होते. उस रिश्ते में एक शोषण करने वाला और दूसरा शोषण सहने वाला होता है. 

अब आते हैं संदीप के बयान पर. उन्होंने फिल्म क्रिटिक अनुपमा चोपड़ा को दिए एक इंटरव्यू में कहा था,

'जब आप किसी महिला से (या कोई महिला पुरुष से) प्यार में होते हैं और ज़्यादा कनेक्टेड होते हैं, इसमें बहुत ईमानदारी होती है. अगर आप शारीरिक रूप से खुद को व्यक्त नहीं कर रहे, अगर आपके पास एक-दूसरे को थप्पड़ मारने की आज़ादी नहीं है, मुझे वहां कुछ नहीं दिखाई देता. प्रीति ने कबीर को बेवजह थप्पड़ मारा था, कबीर के पास कम से कम वजह तो थी. अगर आप अपनी पत्नी-गर्लफ्रेंड को जहां चाहें वहां थप्पड़ नहीं मार सकते, छू नहीं सकते, किस नहीं कर सकते, मुझे वहां कोई इमोशन नज़र नहीं आता.'

लोगों का गुस्सा संदीप की सोच, उनकी बातों पर था. जो ये बताती है कि मारपीट कर प्यार जताया जा सकता है. जबरन छूकर अपना प्यार साबित किया जा सकता है. अपने प्रेमी या प्रेमिका की इच्छा को नजरअंदाज करना सामान्य बात है. मोलेस्ट करना भी प्रेम का ही पर्याय है.

sandeep-750x500_072619081800.jpgकबीर सिंह तेलुगू फिल्म 'अर्जुन रेड्डी' की रीमेक है. इसके डायरेक्टर भी संदीप रेड्डी वांगा हैं.

इसी इंटरव्यू में संदीप कबीर सिंह के एंगर मैनेजमेंट इश्यू के बारे में हंसते हुए कहते हैं,

'बच्चा होने के बाद कबीर सिंह बदल जाएगा, जाहिर है उसका गुस्सा भी कम हो जाएगा.'

ऐसा सोचने वाले संदीप इकलौते इंसान नहीं हैं. देश की आधी से ज्यादा आबादी ऐसा ही सोचती है. इसीलिए बेहद आवारा, बदमाश, लोफर लड़कों की भी शादी कर दी जाती है. बेरोजगार और नाकारा लोगों को भी शादी योग्य वर माना जाता है. क्योंकि उसके पीछे भी यही सोच होती है कि शादी और बच्चे होने के बाद जिम्मेदारी आ जाएगी और लड़का सुधर जाएगा. नतीजे सभी जानते हैं. ऐसी लड़कियां परिवार में, समाज में तिरस्कार और अपमान के साथ जीती हैं. या फिर खुद को खत्म कर लेती हैं.

खैर, 'कबीर सिंह' के डायरेक्टर और कास्ट के लिए यही बेहतर होगा कि वो अलग-अलग तरीकों से फिल्म की कहानी और कैरेक्टर पर सफाई देना बंद कर दें. जो हो गया, सो हो गया. अब आगे बढ़ें. कोशिश करें कि कोई 'नॉन प्रॉब्लमेटिक कैरेक्टर' और 'वास्तविक' कहानी पर फिल्म बनाएं.

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