डियर आयुषी,अगर तुम दुनिया को सबक सिखाना चाहती हो तो अपनी सीखने की आदत न मरने देना

भारी चीजें भी सीखने को रेडी रहना

आशुतोष चचा आशुतोष चचा
जनवरी 10, 2019

आप पढ़ रहे हैं हमारी सीरीज- 'डियर आयुषी'. रिलेशनशिप की इस सीरीज में हम हर हफ्ते 'चचा' की एक चिट्ठी पब्लिश करेंगे. वो चिट्ठी, जिसे वह अपनी बेटी आयुषी के लिए लिखते हैं. इन चिट्ठियों से आपको ये जानने को मिलेगा कि एक पिता अपनी बेटी के लिए क्या चाहता है. ये चिट्ठियां हर उस पिता की कहानी बयान करेंगी, जिनके लिए उनकी बेटी किसी 'परी' से कम नहीं होती, जिनके लिए उनकी बेटी कुदरत की सबसे प्यारी रचना होती हैं. 

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यार तुम्हारे हाथ में लैपटॉप देकर कित्ती बड़ी गलती की मैंने. इत्ती भयंकर सर्दी में तुम वो पिच्चर देख रही थी. फ्रोजेन. मेरी नजर पड़ी तो लपककर बंद किया. देखो ठंडी में बर्फ, पानी, स्विमिंग, स्नान, इन सब चीजों के वीडियो देखना पाप है. आत्मा कांप जाती है. अच्छा चलो ठंडी की बात अभी नहीं करते हैं, बात करते हैं सीखने की. वो सबक नहीं जो जिंदगी सिखाती है. ये सब दार्शनिक टाइप बातें करके तुमको बोर नहीं करूंगा. हां, ये बातें आती बहुत हैं मुझे लेकिन शो ऑफ करने को मना किया है मम्मी ने. तो अपन सीखने की बात ही करेंगे.

हां तो मैटर ये हुआ कि हम मिडिल क्लास लोग एक महीने की प्लानिंग करके चलते हैं. और महीना भी दो हिस्सों में बंटा होता है. सैलरी से पहले और सैलरी के बाद. हमारी पूरी प्लानिंग बस इतने भर के लिए होती है. वीकेंड पर जाकर फिल्म देख लेंगे. इस बार तीन दिन की छुट्टी है तो हिल स्टेशन चल लेते हैं. ऑफिस में रोज का काम रोज खतम कर लेंगे. स्मूथ वाली लाइफ जीते रहेंगे. इस परंपरा को तोड़ने आता है न्यू इयर. जिसमें हम पूरे साल के लिए रेजोल्यूशन लेते हैं. लेकिन वो सब जनवरी बीतने के साथ खर्च हो जाते हैं. फिर से जिंदगी वीकेंड का इंतजार करने लगती है. 

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अब उन लोगों को देखो जिन्होंने जीवन में कुछ उखाड़ा है. वो अपने सामने लक्ष्य लेकर चलते हैं साल-दो साल के लिए. सरकारें भी इसी हिसाब से प्लान करती हैं. अगर उनको एक दिन या महीने का टारगेट दिया जाए तो उनसे कुछ हो ही नहीं पायेगा. बड़े लोगों का मतलब सिर्फ़ पैसे वाले नहीं, हुनर वाले भी. संगीत रचने वाले, फ़िल्में बनाने वाले, बिल्डिंग्स बनाने वाले, आर्ट बनाने वाले, किताबें लिखने वाले, सभी टारगेट सेट करते हैं, बिना टारगेट के तो कुछ हो ही नहीं पायेगा. लेकिन लंबे समय के लिए. जितना समय वो अपने क्राफ़्ट को या खोज को देते हैं वो खुद उन्हें और देखने, सुनने, पढ़ने, बरतने वालों को सुकून देती है. कभी कभी तो लगता है कि छोटे गोल्स के चक्कर मैं घिसा पड़ा हूं नहीं तो तीर मार देता.

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अब इस साल मैंने ख़ुद को नए और बड़े टारगेट दिए हैं. उन पर काम भी शुरू कर दिया है। मैं इनके लिए जूझ जाऊंगा. और अगर सफल हो गया तो तुमको शिक्षा दूंगा कि तुम भी करके देखना कभी. असफल हो गया तो भी चिट्ठी लिखूंगा एक ऐसी ही. और बताऊंगा कि इन सब चक्करों में मत पड़ो बिटिया. रोज़ लो मौज लो. मुझको मालूम है कि तुमको कुछ कहने का कोई मतलब नहीं है, करोगी वही जो तुम्हारा मन कहेगा. लेकिन फिर भी हम जैसे ज्ञानी लोग अपने आइडियाज थोपना थोड़ी छोड़ेंगे. मैं इस साल काफ़ी कुछ सीख रहा हूं. तुम तो हो ही ब्रिलियंट. इतनी जल्दी रहती है तुमको सीखने की. बॉबी फ़िल्म के बाबा आदम के ज़माने के गाने तुमने रट रखे हैं. लेकिन भारी चीजें भी सीखने को रेडी रहना. अगर तुम दुनिया को सबक सिखाना चाहती हो तो अपनी सीखने की आदत न मरने देना.

 

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