'लड़की हो साइंस पढ़कर क्या करोगी? इस एक सवाल ने मैथ से मेरा ब्रेक-अप करवा दिया'

टीचर्स ये क्यों नहीं बताते कि मैथ्स के सवालों में X की वैल्यू खोजकर बड़े-बड़े रॉकेट लॉन्च होते हैं.

लालिमा लालिमा
अगस्त 03, 2019
'फोटोग्राफ' फिल्म का एक सीन. इसमें सान्या मल्होत्रा सीए की तैयारी कर रही होती हैं.

मैं जब 6वीं में थी, तब मैथ्स में मेरे 100 में से 7 नंबर आए थे. कॉन्फिडेंस एकदम गिर गया था. फिर मैंने सप्लीमेंट्री परीक्षा दी. रात में 1-1 बजे तक जागकर पढ़ाई की. फिर चमत्कार हो गया, कॉन्फिडेंस थोड़ा बढ़ गया. 100 में से 60 नंबर आ गए. फिर थोड़ा और कॉन्फिडेंस बढ़ा, 7वीं में बिना सप्लीमेंट्री आए बाउंड्री पास हो गई. फिर 8वीं में तो तमतमाते हुए कॉन्फिडेंस बढ़ा. एनुअल एग्जाम में 70 से ज्यादा नंबर आ गए. तब मैंने डिसाइड कर लिया कि अब कुछ भी हो जाए, 11वीं में तो मैथ्स सब्जेक्ट ही लेना है.

10वीं में 85 नंबर आ गए, और मैथ्स सब्जेक्ट मिल भी गया. लेकिन फिर भी मेरे मन में हमेशा एक डर रहता था. वो ये कि कहीं 6वीं की तरह 11वीं, 12वीं में फिर से 7 नंबर न आ जाएं. ये डर मेरे दिल में इतनी बुरी तरह से बस गया, कि 6वीं पास करने के 20 साल बाद भी डरावने सपने आते हैं. सपने में दिखता है कि मैं एक बार फिर 6वीं की परीक्षा दे रही हूं, और एक बार फिर मैथ्स में मेरे 7 नंबर आए हैं. मैं मैथ्स का पेपर देने जा रही हूं, और पेपर छूट रहा है. जाहिर सी बात है, ये सपने तो आएंगे ही, क्योंकि मैंने 6वीं में फेल होने के लिए खासी मेहनत जो की थी.

kota-1_080319023407.jpgTVF के 'कोटा फैक्ट्री' सीरीज का एक सीन. इसमें आईआईटी के एंट्रेंस एग्जाम की तैयारी करने वाले बच्चों की कहानी बताई गई है.

मुझे मैथ्स बड़ा पसंद था. लेकिन फिर भी 6वीं में 7 नंबर आए. 11वीं-12वीं में मैथ्स ले तो लिया, क्योंकि पसंद था. लेकिन नंबर अच्छे नहीं आए. ऐसा क्यों? मैं पढ़ने में कमजोर भी नहीं थी. फिर ऐसा क्यों हुआ-

- 6वीं में पढ़ाने वाले टीचर का तरीका बकवास था. वो क्या पढ़ाते थे, मुझे क्या. किसी को भी समझ नहीं आता था. और 6वीं में तो एलजेब्रा एंट्री मारता है. अंकों के साथ-साथ A B C D... भी मैथ्स में घुस जाती है. तो ऐसे में टीचर का फर्ज बनता है, कि बेसिक क्लीयर करके पढ़ाए. लेकिन टीचर के पढ़ाने का तरीका ऐसा था, जिसे देखकर लगता था कि उनके खुद के बेसिक क्लियर नहीं होंगे. 8वीं में 70 से ज्यादा इसलिए आए थे. क्योंकि टीचर अच्छी थीं. शानदार तरीके से पढ़ाया था. बेसिक तो सॉलिड तरीके से क्लियर कर दिया था. 10वीं तक अच्छे टीचर रहे. फिर 11वीं-12वीं में 6वीं वाले टीचर की एंट्री हो गई. ये दोनों क्लास फिर से बर्बाद हो गई.

- दूसरा, ज्यादातर स्कूलों में मैथ पढ़ाई तो जाती हैं, लेकिन उन्हें रटवाया जाता है. पहाड़े रटवाए जाते हैं. मैथ्स ऐसा सब्जेक्ट है, जो रटकर पार नहीं किया जा सकता. उसे समझा जाता है.

- तीसरा, मुझे कभी ये नहीं बताया गया, कि मैं जो A, B, C, D... वाले सवाल हल कर रही हूं, उसका असल जिंदगी में क्या इस्तेमाल है. जो X की वैल्यू मैं खोज रही थी, उसे खोजकर उसे मिलेगा क्या? वो कहां काम आएगी. उसे अगर ये बता दिया जाता कि ये X की वैल्यू रॉकेट लॉन्च करने के काम आएगी, प्लेन उड़ाने के काम आएगी, तो शायद मैं दिल लगाकर पढ़ती.

- चौथा, मेरे घर पर, स्कूल में हमेशा मुझसे कहा जाता, कि अरे तुम तो लड़की हो, होमसाइंस ले लेना. मैथ्स लेकर क्या करोगी? लड़कियों के लिए नहीं है मैथ्स. लड़कियां नहीं कर पाती हैं मैथ्स के सवाल हल. कहीं न कहीं, प्रत्यक्ष नहीं तो सबकॉन्शियस में ऐसी बातों का असर पड़ता ही है. कभी-कभी लगता है कि सपोर्ट मिलता तो शायद मैथ से मेरा ब्रेक-अप न हुआ होता.

kota-2_080319023721.jpg'कोटा फैक्ट्री' सीरीज का ही एक सीन.

लड़कियां बचपन से ही ये सुनती हैं, कि मैथ्स करके क्या मिलेगा तुम्हें? क्या जरूरत है? इन बातों का ऐसा असर हुआ है, कि आज आईटी इंडस्ट्री में लड़कियों की बहुत कमी है. जहां कहीं भी आप देखेंगे, आईटी इंडस्ट्री में आपको लड़के ही मिलेंगे.

belong.co की एक रिपोर्ट के मुताबिक इंडियन टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री में केवल 34 फीसद औरतें हैं. और केवल 26 फीसद औरतें इंजीनियरिंग रोल्स में हैं. इस इंडस्ट्री में लीड रोल भी बहुत ही कम औरतों के पास है. यहां लड़कियों की बहुत किल्लत है. इसका सबसे बड़ा कारण ये है, कि 11वीं-12वीं में बहुत ही कम लड़कियां मैथ्स सब्जेक्ट लेती हैं. और जो लेती भी हैं, तो किसी न किसी वजह से उसे कंटिन्यू नहीं कर पातीं.

इंजीनियरिंग के कॉलेजों और ब्रांच को ही देख लें, तो ये अंतर साफ दिखता है. मैकेनिकल और सिविल इंजीनियरिंग में लड़कियां न के बराबर होती हैं. कितनी सीट्स तो खाली पड़ी रहती हैं.

टेक्नोलॉजी की दुनिया आज भी लड़कों की दुनिया मानी जाती है. एक सोच है कि लड़के ही टेक्नोलॉजी में बेस्ट होते हैं. बहुत से घरों में छोटे लड़कों को यही कहा जाता है, कि बेटा आगे चलकर तुम्हें इंजीनियर बनना है. इसलिए मैथ्स सब्जेक्ट ही लेना. लड़कों के ऊपर भी एक तरह का प्रेशर होता है. उन्हें बचपन से ये लगने लगता है, कि मैथ्स लेकर ही वो ये साबित कर सकते हैं कि उनके अंदर दम है. उन्हें लगने लगता है, कि मैथ्स नहीं लेंगे तो नाक कट जाएगी. इसी चक्कर में कई लड़के न चाहते हुए भी, केवल नाक बचाने के लिए मैथ्स ले लेते हैं. आईटी सेक्टर में काम करने वाले कई लड़के, तो असल में उस सेक्टर में काम करना ही नहीं चाहते. लेकिन वो भी क्या करें, मोरल प्रेशर इतना ज्यादा होता है, कि चुप्पी साधनी पड़ जाती है.

idiot_080319023508.jpg'थ्री इडियट्स' फिल्म का एक सीन. इस फिल्म में फरहान वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर बनना चाहता था, लेकिन उसे मजबूरी में इंजीनियरिंग करनी पड़ी. 

मैथ्स एक सब्जेक्ट है. लेकिन इसे नाक का सवाल बना दिया गया है. लड़कियां ये सब्जेक्ट लेने से कतराती हैं, और वहीं कुछ लड़के प्रेशर में इसे लेते हैं.

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