फिल्म रिव्यू: गली बॉय

एक बेहतरीन फिल्म देखते हुए बस ये खटका कि 'गली गर्ल' क्यूं नहीं?

दर्पण साह दर्पण साह
फरवरी 14, 2019
फिल्म 'गली बॉय' का एक सीन.

‘गली बॉय’ मुंबई के दो बंदों विवियन फर्नांडिस ‘डिवाइन’ और नावेद शेख ‘नेज़ी’ के जीवन पर बेस्ड है. इन दोनों का गीत ‘मेरी गली में’ बच्चे-बच्चे की ज़ुबान पर चढ़ गया था.

फिल्म की कहानी की बात करें तो मुराद मुंबई के स्लम में रहने वाला एक मुस्लिम लड़का है. उसके 6 लोगों के परिवार में केवल उसके पिता ही हैं जो कमाते हैं. लेकिन पिता के चोटिल हो जाने के बाद उसे अपने बाप के बदले ड्राईवर की जॉब करनी पड़ती है. जबकि उसका सपना तो कुछ और है, कुछ बहुत बड़ा है. क्या है वो सपना और क्या वो पूरा होता है या नहीं ये जानने के लिए इस म्यूज़िकल को देखने जाया जा सकता है. इस वैलेंटाइन वाले मौसम को मुराद और उसकी प्रेमिका सफीना के बीच का रिलेशनशिप कर्व और दिलचस्प बना देगा.

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मैनेजमेंट और इकोनॉमिक्स से लेकर फिलोसॉफी तक के पहले कुछ पाठों में ही ‘मास्लो पिरामिड’ पढ़ा दिया जाता है. इसमें बताया जाता है कि इंसान में कुछ कर गुज़रने की चाहत सबसे लास्ट में आती है. सबसे पहले शारीरिक ज़रूरतें – रोटी, कपड़ा, मकान और आज के दौर में इंटरनेट. फिर आती है सुरक्षा. फिर सामाजिक ज़रूरतें, फिर सेल्फ एस्टीम और सबसे अंत में आती है कला या म्यूजिक जैसी चीज़ें. सामान्य बातचीत में भी कहा जाता है कि भूखे पेट भजन न होय गोपाला. लेकिन लगता है कि कहीं न कहीं एकेडेमिक्स का ये सर्व-स्वीकार्य सिद्धांत ‘गली बॉय’ के एक डायलॉग से धूल-धुसरित हो जाता है –

"जित्ते भी चीट-फाड़ आर्टिस्ट हुए न आजतक सबके सब भूखे फक्कड़. हालत ऐसी कि जो मिलेगा नोच खाएंगे. बीट चुरा के फिर उसी भूख की कहानी बोले, फिर जाके कुछ उखाड़े."

यही तो सच्चाई है. नहीं? काल बेलियों के डांस से लेकर बंजारों के गीत हों या अमेरिका में सदियों से हाशिए पर रहे अश्वेतों का हिप हॉप, या फिर माइकल जैक्सन, विन्सेंट वैन गॉग से लेकर रील लाइफ के भी कुछ सच्चाई के नज़दीक करैक्टर्स, जैसे मराठी फिल्म ‘कोर्ट’ का मुख्य किरदार. सब इस बात की ताकीद करते हैं कि अच्छी कला बुरे वक्त की देन होती है.

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यूं ‘गली बॉय’ रणवीर के करैक्टर मुराद के हार्डशिप की, जो कि वाकई ‘बहुत हार्ड’ है, कहानी नहीं पूरे मार्जिनलाइज्ड समाज के हार्डशिप की कहानी है. एक दर्शक के रूप में रणवीर की छोटी-छोटी सफलता को लेकर आपको ख़ुशी कम होती है, लेकिन आसपास के लोगों को देखकर यकीन ज़्यादा होता है कि 100 में 1 ही होता है जो खबरों में आता है. रिक्शे चलाने वाले के बेटे ने किया सीए एग्जाम टॉप. बाकि निन्यानवे सर झुकाकर अपने सपने और आस पास की रियल्टी के साथ बैलेंस बनाकर चलने पर मजबूर होते हैं.

एक अच्छे कंटेंट की विशेषता होती है कि वो एक किरदार से शुरू होकर एक पूरे समाज की कहानी हो जाए. फिर चाहे वो गोर्की का नॉवेल ‘मां’ हो, फणीश्वर का ‘मैला आंचल’ हो, या आनंद ब्रदर्स की मूवी ‘गाइड’. ‘गली बॉय’ भी अपने वितान को एक व्यक्ति से एक पूरी कम्युनिटी तक बड़ी ख़ूबसूरती से फ़ैलाने में सफल रहती है इसलिए स्टैंड अपार्ट साबित होती है.

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गली बॉय के एक सीन में जब रणवीर ड्राईवर के रूप में पीछे बैठी लड़की का रोना सुनता है तो उससे भी उसके मन में एक कविता फूटती है. ये ऐसा ही है जैसे जब आप प्रेम में होते हैं तो रस्ते में जा रहे बच्चों के बालों को भी सहलाते हुए चलते हैं.

‘गली बॉय’ एक छोटे टाइम फ्रेम की ‘कमिंग ऑफ़ दी एज’ मूवी भी है. लेकिन मुराद की मां अपने बच्चे के बड़े होने पर उतनी ही दुखी होती है जितनीदुनिया की कोई भी मां. वो रोती नहीं है लेकिन आपकी पलकें भीग सकती हैं जब वो कहती है – तू कब इतना बड़ा हो गया रे?

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इधर मुराद की हार्डशिप है, जो अपने को प्रूव करने के चलते है. उधर सफीना की हार्डशिप है, जो केवल उसके अस्तित्व के चलते है. मतलब उसका होना, उसका लड़की होना ही उसका संघर्ष है. जहां मुराद अपने सपनों को पूरा करने के चक्कर में अपने पिता से पिटता है, वहीं सफीना का किरदार निभा रही आलिया केवल अपने होने के चक्कर में अपनी मां से पिट जाती है. इसलिए पिट जाती है क्यूंकि उसे भी घूमना फिरना है, पार्टी करनी है, पुरुष दोस्तों से मिलना-जुलना है. लेकिन आपको ये सब एग्ज़ज़रेटेड नहीं लगता. किसी और दुनिया का नहीं लगता. मतलब सोचिए न अभी तो लिबरल घर की स्त्री उन चीज़ों के लिए ही लड़ रही है, जो किसी पिछड़ी सोच के घर के लड़के के लिए ‘जस्ट अदर थिंग’ है.

स्त्री विमर्शों में बात-बात पर ‘सिमोन’,’ओप्रा’ और ‘माया एंजेलो’ के संदर्भ लानेवाले हम लोग इस बात को समझ पाने में असमर्थ हैं कि एक महिला द्वारा डायरेक्ट की गई फिल्म ‘गली गर्ल’ क्यूं नहीं हो सकती. क्यूं आज तक ऐसे हालात नहीं बन पाए? और बन भी पाए तो वो 100 में से 1 वाले एक्सेप्शन की तरह ही है. फिल्म के एक सीन में भी 500 कंपटीटर्स में से हमें एक लड़की दिखाई देती है.

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बहरहाल, इन सब के बावज़ूद, आलिया का किरदार बहुत स्ट्रॉन्ग है. जिसका प्रेम इतना प्योर है कि वो पज़ेसिवनेस की हद तक पहुंच जाता है. जब मुराद आलिया को चीट कर रहा होता है, तो आपको आलिया के लिए बुरा लगता है. सो मच सो कि सिनेमा हॉल में मुझे उस चीटिंग वाले सीन के दौरान अगल-बगल की कई सीटों से ‘ओह नो’ जैसी बेसाख्ता निकली आवाज़ें सुनाई दे रही थीं. लेकिन फिर भी वो इस ‘गली बॉय’ से बेइंतेहा इश्क में है.

ये देखिए कि फिल्म रणवीर के किरदार को केंद्र में रखकर बनाई गई है फिर भी डायलॉग सफीना के फेमस होंगे, हो रहे हैं –

मर जाइंगा तू.

मेरे बॉयफ्रेंड से गुलू-गुलू करेंगी तो धोपटूंगी ही न उसको.

खाना बनाना नहीं आता पर

मुझे लगता है कि पिछले दसेक सालों में आई अभिनेत्रियों में से एक्टिंग के मामले में आलिया सर्वोत्तम हैं. मेरे इस मानने पर ‘गली बॉय’ फिर से मुहर लगाती है. फिर चाहे उनके हाव-भाव हो, उनका ड्रेस अप या उनका एटीट्यूड.

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विजय राज को कास्टिंग में देखकर लगा कि कुछ ह्यूमर लाएंगे. लेकिन उनका रोल ‘महत्तम’ वाली कैपिंग तक सीरियस है. कल्कि जैसे रोल्स के लिए जानी जाती हैं वैसा ही रोल उन्हें दिया गया है. इसके लिए फुल मार्क्स टू कास्टिंग डायरेक्टर.

फिल्म के म्यूजिक की बात करें तो वो इसमें हर कहीं है, बैकग्राउंड स्कोर में बीट्स हैं तो डायलॉग में हिप-हॉप है. जहां गीत हैं, वहां गीत नहीं रैप है. और जहां रैप है, वहां रैप नहीं, कविताएं हैं. कविताएं वो भी प्रेम कविताएं कम, जन-कविताएं ज़्यादा. ‘आज़ादी’ या ‘दूरी’ सरीखीं.

‘मेरी गली में’ गीत सुनकर आपको ए. आर. रहमान के ‘पट्टी रेप’ की याद आ सकती है और एम टीवी में आने वाले एक सीरयल ट्रिपिंग की भी. ‘अपना टाइम आएगा’, की सफलता का आलम ये है कि इसके ऊपर दसियों पैरोडीज़ बन चुकी हैं. जावेद अख्तर के अलावा ‘डिवाइन-नेज़ी’, जिनपर ये फिल्म बेस्ड है, ने मिलकर कमाल के गीत लिखे हैं. कुल 18 गीतों के इस एल्बम में म्यूजिक बहुत से लोगों ने दिया है और ये कॉकटेल आपको एक ही बार में ही हाई कर देती है. बावज़ूद इसके आप ‘लूप’ के ढेरों बॉटम्स अप लेने से खुद को नहीं रोक पाते हो. लिरिक्स में पॉलिटिक्स, सोसाइटी, मोटिवेशन, लव, लगभग सब कुछ सुनने को मिलता है. लेकिन ये खिचड़ी टेस्टी लगती है.

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ये जान लीजिए कि जब आप इस मूवी का रिव्यू कर रहे होते हो तो आप एक म्यूज़िक एल्बम का भी रिव्यू कर रहे होते हो. हर म्यूजिक को केंद्र में रखी गई फिल्मों की यही खूबी होती है. होने को इस तरह की मूवीज़ विश्व भर में बनती रही हैं. हालिया रिलीज़ हुई ‘बोहेमियन रहपसोडी’ इसी विधा की एक और फिल्म है जो अब ऑस्कर में धमाल मचाने के लिए तैयार है. लेकिन इंडिया में ऐसी फ़िल्में बहुत कम देखने को मिलती हैं. साल दो साल में एक आ जाए तो आ जाएं. फरहान अख्तर ने कुछेक साल पहले म्यूज़िक के बैकड्रॉप पर एक फिल्म बनाई थी – रॉक ऑन. और अब उनकी बहन ज़ोया अख्तर की ये मूवी आई है. बीच में काफी सालों के अंतराल के बाद रॉकस्टार आई थी. आशिकी 2 और अन्धाधुन जैसी लूज़ली म्यूजिक बेस्ड फिल्मों को भी जोड़ दिया जाए तो पिछले दो दशकों में कुल इतनी बॉलीवुड फ़िल्में कि आप उन्हें उंगलियों में गिन सकते हो. तो यूं फिल्म की थीम सेलेक्शन के लिए भी इसे फुल मार्क्स दिए जाने चाहिए.

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फिल्म में एक बड़ा पैराडॉक्स है. पॉजिटिव पैराडॉक्स. वो ये कि फिल्म में चीज़ें इतनी रॉ, इतनी भदेस दिखाई गई हैं कि आपको कैमरा एंगल से लेकर लोकेशन तक का चयन वर्ल्ड क्लास लगता है. धारावी देखकर आपको अपने आस-पास की झुग्गी बस्ती के साथ-साथ ‘सिटी ऑफ़ गॉड’ की भी याद आती है. फॉर्मल्स में रैप कर रहे रणबीर को देखकर आपको प्राइवेट जॉब कर रहे किसी बंदे के साथ-साथ ‘फाइट क्लब’ के एडवर्ड नॉर्टन की भी याद आती है.

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फिल्म की सफलता होती है जब वो लंबे समय तक याद की जाए. लेकिन उस फिल्म के बारे में क्या कहा जाए जो एक नया जेनर, नई विधा पैदा करने की क्षमता रखती है? ‘गली बॉय’ जाने-अंजाने ऐसा ही करती है. सबसे कमाल है चीज़ों का सामान्यीकरण. मने अच्छे सेंस में. रणवीर सिंह से लेकर आलिया भट्ट की एंट्री हो या इंटरवल और दी एंड. सब कुछ इतना सामान्य होता है कि फिल्म को वास्तविकता के करीब लाने में और ज़्यादा मदद करता है. अंत ऐसा होता है कि लगता ही नहीं अंत हो गया, लेकिन साथ में ये भी लगता है कि शायद इससे बढ़िया एंड नहीं हो सकता.

यही चीज़, यानी शॉक फैक्टर का न होना या ‘कहानी’ सरीखी कहानी का न होना इस फिल्म की एक मात्र कमी भी है. यूं घटनाएं अव्वल तो बहुत कम घटती हैं, और अगर वो घटें भी तो उनमें शॉक फेक्टर का सर्वथा अभाव रहता है. ये एक मात्र कमी ‘कॉमर्शियल सिनेमा’ की सबसे बड़ी कमी मानी जाएगी. बहरहाल.

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