वीरांगना भाग 3: नेताजी सुभाष चंद्र बोस को खून की चिट्ठी भेजने वाली लीडर

वीरांगना भाग 3: देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाली औरतें.

आप पढ़ रहे हैं हमारी स्पेशल सीरीज- वीरांगना. ये सीरीज हम ख़ास तौर पर लेकर आए हैं भारत की आज़ादी का 73वां साल पूरा होने पर. इस सीरीज में हम उन सभी औरतों और लड़कियों के बारे में बताएंगे जिन्होंने भारत की आज़ादी में कभी न भुलाया जा सकने वाला किरदार निभाया. 15 अगस्त तक चलने वाली हमारी ये सीरीज उन सभी कहानियों से आपको रू-ब-रू कराएगी जो हमें अक्सर किताबों में पढ़ने को नहीं मिलीं. वीरांगना सीरीज में आज जानिए कैप्टेन लक्ष्मी सहगल के बारे में.

सन 1943. नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिन्द फ़ौज की बागडोर संभाल ली थी. 6 हफ़्तों के भीतर भीतर 30000 सदस्यों से बढ़कर 60000 लोग आईएनए के सदस्य बन चुके थे. जो वॉलंटियर्स आए थे, वो इंडोनेशिया, मलेशिया, बर्मा, हांगकांग जैसी जगहों से थे. लेकिन इन्हीं के बीच बोस के मन में कुछ चल रहा था जो इस स्वतंत्रता संग्राम के लिए एक अनोखी बात थी. नेताजी सुभाष चंद्र बोस आज़ाद हिन्द फ़ौज में औरतों की एक पलटन बनाना चाहते थे.

इस पलटन को लीड कर इतिहास बनाने वाली थीं लक्ष्मी सहगल.

मद्रास मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरी की अपनी पढ़ाई खत्म कर लक्ष्मी स्वामीनाथन सिंगापुर के लिए निकल गईं. वहां अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस शुरू की. उस समय वहां मौजूद आज़ाद हिन्द फ़ौज की कमान संभालने वाली टीम में थे के. पी. केशव मेनन, एस. सी. गुहा, और एन. राघवन. इन लोगों ने बहुत कोशिश की कि आज़ाद हिन्द फ़ौज को जापानी सेना के साथ लड़ने का मौका मिले लेकिन जापानी इस बात को लेकर कुछ भी पक्का नहीं कर रहे थे. तब आए नेताजी सुभाष चंद्र बोस. उनके आने पर चीज़ें तेज़ी से निपटनी शुरू हुईं. लक्ष्मी ने जब ये देखा तो नेताजी के साथ मीटिंग की दरख्वास्त दी. लक्ष्मी जानती थीं कि नेताजी की बड़ी इच्छा है कि औरतें भी आज़ादी की इस लड़ाई में भाग लें. मीटिंग से बाहर निकलते ही उनको आदेश मिल चुके थे एक महिला रेजिमेंट बनाने के.

कैप्टेन लक्ष्मी की शादी पी.के.एन.राव से हुई थी, पर चली नहीं. फोटो: pinterest कैप्टेन लक्ष्मी की शादी पी.के.एन.राव से हुई थी, पर चली नहीं. फोटो: pinterest

नाम होना था, रानी झांसी रेजिमेंट. झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के नाम पर गठित महिलाओं की एक टुकड़ी. 1500 ट्रेंड महिला सैनिक, और 200 नर्सें. 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी ने आज़ाद हिन्द सरकार बनाई थी, और उसमें लक्ष्मी स्वामीनाथन को मंत्री बनाया था. इसके दो दिन बाद से रानी झांसी रेजिमेंट की ट्रेनिंग शुरु हो गई थी. सभी को खाकी वर्दी पहननी होती थी, और बाल छोटे रखने होते थे.

पहला अटैक शुरू हुआ सिंगापुर से रंगून की तरफ, जहां से आज़ाद हिन्द फ़ौज को इम्फाल जाना था. लेकिन बीच में ही ब्रिटिश सेना ने उनका ये अटैक रोक लिया. आईएनए के सैनिक इस अटैक के लिए तैयार नहीं थे, उन्हें पीछे हटना पड़ा. इसके बाद उन्होंने दुबारा अटैक किए, लेकिन इस अटैक में रानी झांसी रेजिमेंट शामिल नहीं थी. इसे ख़त्म कर दिया गया था. जिन महिलाओं/लड़कियों के घर बर्मा में थे, उनको वापस भेज दिया गया था.

कैप्टेन लक्ष्मी इस तरह कि इफौज की पहली लीडर थीं भारत में. फोटो: pinterest कैप्टेन लक्ष्मी इस तरह कि इफौज की पहली लीडर थीं भारत में. फोटो: pinterest

रेजिमेंट की सारी औरतों ने खून से साइन करके चिठ्ठी भेजी थी नेताजी को कि वो रानी झांसी रेजिमेंट को बने रहने दें, लेकिन ऐसा हो ना सका. कैप्टेन लक्ष्मी वहीं बर्मा में रुकीं, और आईएनए के एक अस्पताल में ज़ख़्मी लोगों की सेवा में लग गईं. उन सबको ये लगा था कि किसी को उनकी इस जगह का पता नहीं चलेगा, लेकिन ब्रिटिश सेना को इसका पता चल गया. जिस दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस उनसे मिलने आए, उसके अगले दिन अस्पताल पर बम गिरा दिए गए. कैप्टेन लक्ष्मी और उनके साथ जब घायलों को बैलगाड़ी पर लेकर भाग रहे थे, तब रास्ते में ब्रिटिश सेना ने उनको पकड़ लिया.

कैप्टेन लक्ष्मी ने भारत आकर भी देश के लिए काम करना नहीं छोड़ा. फोटो: ट्विटर कैप्टेन लक्ष्मी ने भारत आकर भी देश के लिए काम करना नहीं छोड़ा. फोटो: ट्विटर

लक्ष्मी को साल भर से ज्यादा समय के लिए रंगून में नज़रबंद कर के रखा गया. जब वो भारत वापस लौटीं, तब तक आज़ादी की मुहिम बेहद तेज़ हो चुकी थी. इंडियन नेशनल आर्मी के लिए देश में काफी सहानुभूति थी, और अंग्रेजों के लिए गुस्सा बढ़ता जा रहा था. कैप्टेन लक्ष्मी स्वामीनाथन ने प्रेम कुमार सहगल से शादी की, और कानपुर में बस गईं. 1971 में जब बांग्लादेश युद्ध हुआ था, तब भी उन्होंने कलकत्ता में आने वाले रिफ्यूजियों की देखभाल की थी. 1984 में जब भोपाल गैस ट्रेजेडी हुई थी, तब वहां पर उन्होंने एक मेडिकल टीम लीड की थी.

कैप्टेन लक्ष्मी सहगल ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमेंस एसोसिएशन की फाउंडिंग मेम्बर्स में से एक थीं. फोटो:विकिमीडिया कैप्टेन लक्ष्मी सहगल ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमेंस एसोसिएशन की फाउंडिंग मेम्बर्स में से एक थीं. फोटो:विकिमीडिया

अपनी मौत के कुछ समय पहले तक वो अपने घर के क्लिनिक में मरीजों को देखती थीं, उनका इलाज करती थीं. दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हुआ, और कानपुर में ही उन्होंने अपनी आखिरी विदाई ली. कैप्टेन लक्ष्मी सहगल अपने पीछे जो विरासत छोड़ कर गईं, उसे इस सीरीज के एक भाग में शामिल करना बेहद मुश्किल है. उनकी यादों का एक छोटा सा हिस्सा है जिसे हम याद कर रहे हैं. जाते जाते आपको बता दें कि कैप्टेन लक्ष्मी सहगल की इस विरासत में शाद अली भी शामिल हैं. वही फिल्म डायरेक्टर जिन्होंने साथिया,ओके जानू और सूरमा जैसी फिल्में डिरेक्ट की हैं. वो कैप्टेन सहगल की बेटी सुभाषिनी अली के बेटे हैं.

 

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