औरतों की कामुकता पर खुलकर बात करता विज्ञापन अखबार में देखना अच्छा लगता है

वरना कई साल से हम बस नीम-हकीमों के ऐड देखते आए हैं जो केवल असुरक्षा का भाव बढ़ाते हैं.

नेहा कश्यप नेहा कश्यप
अगस्त 08, 2019
अखबार में छपा स्टीम्यूलेटिंग जेल का ऐड

8 अगस्त को अखबार में स्कोर कंपनी का एक बड़ा सा ऐड छपा है. ये ऐड आज इंटरनेशनल फीमेल ऑर्गेज्म डे होने का दावा करता है. ये विज्ञापन स्टीम्यूलेटिंग जेल के बारे में है.

क्या है ऐड

अखबार में छपे इस ऐड की शुरुआत एक लाइन से होती है.

'हर महिला को कांपना चाहिए'

डर से नहीं

गुस्से से नहीं

सदमे से नहीं

लेकिन, महिला को कांपना चाहिए

अंधेरी सड़क पर नहीं

भीड़ भरी बस में नहीं

ऑफिस के तनावपूर्ण माहौल में नहीं

महिला को कांपना ही चाहिए

अपने कमरे में, यौन सुख से'

अब दो बातें हैं. या तो ऐड को देखकर हॉ-हॉ करिए. या खुले दिमाग से समझिए कि अच्छी मार्केटिंग के साथ-साथ ये ऐड एक अच्छी बात भी कह रहा है. ये बात है औरतों की सेफ्टी की.

कंपनी ने इस ऐड को 'शी कम फर्स्ट' हैशटैग के साथ लॉन्च किया है. दावा है कि ये जेल महिलाओं को सेक्स के दौरान ऑर्गेज्म तक पहुंचाने में मदद करता है. आप कह सकते हैं कि सेक्स और ऑर्गेज्म तो बेहद निजी मसले हैं. जिसके माने सबके लिए अलग हो सकते हैं. आप सवाल उठा सकते हैं कि क्या सेक्स की बातें करना ही औरतों को सशक्त करेगा.

मगर ध्यान से देखें तो ये मसले जुड़े हुए हैं. कैसे? 

फीमेल आर्गेज्म लंबे समय से बहस का विषय रहा है. 2017 में हुए ग्लोबल सेक्स सर्वे आया था. उसके मुताबिक 70 परसेंट भारतीय महिलाएं हर बार सेक्स के दौरान ऑर्गेज्म तक नहीं पहुंच पाती हैं. जबकि पुरुषों के लिए सच ठीक इसका उल्टा है. यौन संबंध की क्रिया का अंत ही तभी होता है, जब पुरुष अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाए. महिलाओं का भी इसमें हिस्सा हो सकता है, ये नहीं सोचा जाता है.

फीमेल ऑर्गेज्म जरूरी है. क्योंकि अगर औरत को सेक्स से उस तरह  का सुख नहीं मिल रहा है, जिस तरह का उसके साथी परुष को मिल रहा है. तो वो पुरुष के लिए या तो सिर्फ एक सेक्स डॉल, या महज एक बच्चा पैदा करने मशीन रह जाएगी. 

अब बात औरतों की सुरक्षा की. औरतें असुरक्षित हैं, क्योंकि वो लोगों के लिए सेक्स ऑब्जेक्ट हैं. उन्हें देखकर लफंगों को लगता है कि इन्हें छू लेना चाहिए, दबोच लेना चाहिए. ये ऐड, हल्के से ही सही, इस बात पर भी जोर डालता है, कि सेक्स के जिस रूप में औरत की मर्ज़ी शामिल न हो, वो सेक्स नहीं है. वो सिर्फ लड़कियों को डरा सकता है, उन्हें डर से कांपने पर मजबूर कर सकता है.  

स्कोर पहली कंपनी नहीं है, जिसने फीमेल ऑर्गेज्म पर बात की हो. 2017 में हुए ड्यूरेक्स ने 'ऑर्गेज्म इनइक्वालिटी कैंपेन' चलाया था. इस कैंपेन में विज्ञापनों के जरिये महिलाओं और पुरुषों की सेक्स ड्राइव और ड्यूरेशन के बारे में बताया गया था. 

ड्यूरेक्स ऑर्गेज्म इनइक्वालिटी कैंपेन में एक ऐड:

 

जब मसला बराबरी का हो, तो बराबरी सेक्स में भी जरूरी है. क्योंकि औरतों के प्रति भेदभाव का मूल कारण ही रही है कि उनके सहमति और सुख को 'अज्यूम' कर लिया जाता है. सड़कों पर औरतों की सहमति और बिस्तर पर औरतों का सुख अज्यूम मत कीजिए. 

क्या समझे? 

 

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