ऐसा देश जहां महिलाओं को अब तक नहीं थी ड्राइविंग की इजाज़त

अब ड्राइविंग लाइसेंस लिए इन महिलाओं की तस्वीर हो रही है वायरल.

फ़र्ज़ कीजिए कि आपने एक स्कूटी ऑडर की है. उसकी डिलीवरी डेट 4 दिनों बाद की है. लेकिन आप उसका बेसब्री से इंतज़ार कर रही हैं. चाहती हैं कि आज के आज ही स्कूटी की चाबी आपके हाथों में आ जाए. और आप बस उसे लेकर उड़ जाएं. ऐसे में अचानक दरवाज़े की घंटी बजती है. और आपके ठीक सामने डिलीवरी ब्वॉय खड़ा हो जाता है. वो भी आपकी नई स्कूटी की चाबी लिए. आपका पहला रिएक्शन क्या होगा? ज़ाहिर है कि खुशी से पगला जाएंगी. लेकिन मेरी लिखी इन बातों को पढ़ते हुए आपके मन में ये बात ज़रूर चल रही होगी कि ऐसा कहां होता है? सब कहने और फ़र्ज़ करने की बाते हैं. जी, वो तो ठीक है. पर सऊदी अरब में इससे कुछ मिलता-जुलता सा ज़रूर हुआ है.

सऊदी की सरकार ने पिछले साल की 26 सितंबर को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. फैसला ये था कि सालों से महिलाओं को ड्राइविंग से वंचित रखने वाली वहां की सरकार ने महिलाओं को ड्राइविंग का हक़ देने की बात कही थी. ये सऊदी जैसे देश के लिए बहुत बड़ी बात है. सो वहां की महिलाओं को इस फैसले के जल्द से जल्द लागू होने का इंतज़ार था. फैसले के हिसाब से महिलाओं को ड्राइविंग की इजाज़त 24 जून से मिलने वाली थी. लेकिन सऊदी की सरकार ने सरप्राइज़ के तौर पर 4 जून को ही देश की दस महिलाओं को ड्राइविंग लाइसेंस इशू कर दिएं.

अब इन महिलाओं के वीडियोज़ और फोटोज़ उनकी ड्राइविंग लाइसेंस के साथ इंटरनेट पर वायरल हो रहे हैं. लोग सऊदी अरब की सरकार के इस कदम की सराहना करते हुए वहां की महिलाओं को मुबारक़बाद दे रहे हैं. लेकिन ऐसे समय में जब महिलाएं चांद पर जा रही हैं, ऐवरेस्ट फतह कर रही हैं, सऊदी अरब की महिलाओं को ड्राइविंग का हक़ भर मिलना क्यों हंगामा बड़पा रहा है. आइए इसको समझते हैं. क्योंकि समझेंगी नहीं तो किसी को समझा भी नहीं पाएंगी.

कहां है सऊदी अरब?                     

सऊदी मध्य पूर्व एशिया का एक देश है. मध्य पूर्व यानी ‘मिडल इस्ट’. अरे, वहीं जहां मक्का-मदीना है. इसे इस्लाम का जन्म स्थल भी कहा जाता है. सऊदी में सुन्नी मुसलमानों की बहुलता है. अब आप कहेंगे सुन्नी क्या है? तो आपको बता दें कि मुसलमान मुख्य रूप से दो समुदायों में बंटे हैं- शिया और सुन्नी. जहां पूरे विश्व में शियाओं की जनसंख्या 10 से 15 प्रतिशत है. और ये ईरान, इराक जैसे देशों में सबसे अधिक बसे हैं. वहीं विश्वभर में मुसलमानों की 85-90 प्रतिशत की आबादी सुन्नी है. सुन्नी मुसलमान वो होते हैं जो ख़ुद को इस्लाम की सबसे धर्मनिष्ठ और पारंपरिक शाखा मानते हैं. अब पूरा मसला यहीं से समझा जा सकता है. 

क्यों सऊदी की महिलाओं को ड्राइविंग जैसी बुनियादी हक़ से वंचित रखा गया?

जैसा कि हमने आपको बताया सऊदी में सुन्नी मुसलमानों की बहुलता है. और वो ख़ुद को सबसे धर्मनिष्ठ और पारंपरिक मानते हैं. ऐसे में वहां रहने वाली महिलाओं पर अलग से एक गार्जियनशीप लॉ लागू हुआ करता था. गार्जियनशीप लॉ यानी ऐसा क़ानून जो महिलाओं को बिना पुरुष (पति,भाई,पिता या बेटे) बाहर निकलने की इजाज़त नहीं देता है. यहां तक की नाचने-गाने से लेकर बास्केट बॉल खेलने, स्टेडियम में मैच देखने, ड्राइव आदी करने की भी इजाज़त नहीं थी.

सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बीन सलमान. सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बीन सलमान.

लेकिन जब से सऊदी के प्रिंस ‘मोहम्मद बीन सलमान’ ने वहां की सत्ता संभाली है. उन्होंने महिलाओं के हक़ और आज़ादी को लेकर वहां के नियमों में कई बदलाव किए हैं. इसके कई कारण हैं. सऊदी की जो छवि है, पूरे विश्व में, वो बेदह ही दकियानूसी परंपराओं को फॉलो करने वाले देश के रूप में है. सलमान अपने देश की इसी छवि को सुधारना चाहते हैं.

इसके इतर एक तर्क यह भी दिया जाता है कि सलमान बीन की नज़दीकी अमरीका से है. वो जानते हैं कि आज भले ही उनका देश सबसे बड़े तेल निर्यातकों में से एक है. और उनकी इकॉनमी इसी के बलबूते फल-फूल रही है. लेकिन आने वाले समय में ऐसा नहीं होगा. उन्हें निवेशों की ज़रूरत पड़ेगी ही पड़ेगी. और अमरीका जैसे देश किसी ऐसे देश में निवेश क्यों करेंगे जहां ऐसी दकियानूसी परंपराओं को फॉलो किया जाता है. जहां महिलाओं को उनके बुनियादी हक़ भी नसीब नहीं. जहां किसी महिला का अकेले घर से निकलना अपराध की श्रेणी में आता है. जहां महिलाओं को सरकारी नौकरी करने तक की इजाज़त नहीं.

गार्जियनशीप लॉ के तहत सऊदी की महिलाओं को उनके बुनियादी हक़ भी नहीं दिए जाते थे. फोटो कर्टसी-रॉयटर्स गार्जियनशीप लॉ के तहत सऊदी की महिलाओं को उनके बुनियादी हक़ भी नहीं दिए जाते थे. फोटो कर्टसी-रॉयटर्स

सलमान इसी बात को समझ चुके हैं. इसी क्रम में वो एक के बाद एक ऐसे फैसले लेते जा रहे हैं. हालांकि कुछ लोगों का यह भी मानना है कि बीन सलमान खुले सोच विचार वाले हैं. इसलिए इतने वर्षों तक अपनी बुनियादी हक़ों से दूर रह चुकी वहां की महिलाओं के लिए वो एक बेहतर माहौल बनाना चाहते हैं.   

 

 

 

 

 

 

 

 

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