प्रियंका चोपड़ा का मज़ाक मत उड़ाइए, उनके इस लुक के पीछे की वजह और इतिहास जानिए जो बेहद दिलचस्प है

मीम पर तो हंस लिए, अब ज़रा दिमाग के घोड़े दौड़ाने का टाइम है

“मैं मानता हूं कि खूबसूरती हर चीज़ में होती है. जिसे सामान्य लोग ‘बदसूरत’ मानते हैं, मुझे उसमें भी कुछ न कुछ सुन्दर नज़र आ जाता है”-

अलेक्जेंडर मैकक्वीन (डिजाइनर, फैशन आइकन)

बचपन में एक कहावत सुनी थी, अपरूप भोजन, पररूप श्रृंगार. यानी भोजन वो खाओ जो खुद को पसंद आए, और कपड़े वो पहनो जो दूसरों को पसंद आएं. फैशन को लेकर काफी समय तक लोगों की समझ यही रही. सुन्दर कपड़े पहनना. वैसे कपड़े, जो ट्रेंड बना दें. जैसे यशराज फिल्मों में हिरोइन की शिफॉन की साड़ी. या जूते ले लो, पैसे दे दो गाने में माधुरी का हरा और सफ़ेद लहंगा. दूरदर्शन पर न्यूज पढ़ने आतीं सलमा सुलतान के जूड़े में लगा फूल. अमिताभ बच्चन की बेल बॉटम पैंट. ये भारत में पल बढ़ रहे लोगों की पूरी की पूरी पीढ़ी का फैशन स्टेटमेंट बने.

आज की पीढ़ी के फैशन स्टेटमेंट तय करने वाले दुनिया के कोने-कोने में फ़ैल गए हैं. मालदीव में बैठी फैशन ब्लॉगर मुंबई में रहने वाली, मीठीबाई में पढ़ने वाली लड़की के बालों का रंग तय करती है. अपने एक पोस्ट से. काइली जेनर की लिपकिट खरीद कर उसे दुनिया की सबसे कमउम्र महिला अरबपति बनाने वाली लड़कियां सिर्फ अमेरिका में नहीं  रहती थीं. फैशन रनवे से उतर कर सरोजिनी नगर/लिंकिंग रोड पहुंचने में वक़्त नहीं लगाता. किसी टी-शर्ट पर एक लाइन चल जाती है, तो वैसी ही लाखों बाज़ार में अगले दिन उतर जातीं.

kim_770_050919024944.jpgआज के टाइम की इंस्पिरेशन किम कारदाशियन हैं. इनकी बहनें हैं. जो करें, वो ट्रेंड.

जब रनवे से फैशन सड़कों पर आ जाए, तो रनवे पर क्या हो?

फैशन शब्द हमारी चेतना में एक अजीब से शब्द के रूप में उकरा हुआ है. अधिकतर के मन में एक नेगेटिव सी फीलिंग लिए. स्कूल में कोई लड़की बाल खोलकर चली जाए, तो टीचर्स आपस में खुसर-पुसर करती हुई कहती हैं, ‘फैशन का बुखार चढ़ा है इनको’. कोई उम्रदराज महिला चटख मेकअप कर के निकल जाए, तो उसे ‘फैशनबाज़’ का तमगा दे दिया जाता है. लब्बोलुआब ये कि फैशन की समझ इतनी गहरी नहीं है अभी आम जनमानस में कि उसे कपड़ों से इतर करके किसी और सलीके से देखा जा सके. जबकि मार्क जेकब्स (मशहूर स्टाइलिस्ट, डिजाइनर) ने कहा है, ‘कपड़ों का मतलब तब तक कुछ नहीं होता जब तक कोई उनमें जीना ना शुरू कर दे’. और जब फैशन की समझ यहां तक ही रह जाती है, तब शुरू होती है उसके प्रति एक अस्वीकार्यता. उसे नकार देने की भावना. कि वो जो है, वो दूर से हंस लेने और मज़ाक उड़ा लेने के लिए है.

इसीलिए जब प्रियंका चोपड़ा, या सोनम कपूर किसी इवेंट में डिजाइनर कपड़े पहनकर उतरती हैं, तो उनका ‘फैशन’ सिर्फ एक मज़ाक उड़ाने की चीज़ बन जाता है. एक पंचिंग बैग. जिस पर मीम बनाए जा सकते हैं. जिनका मज़ाक उड़ाया जा सकता है.

एक तीन सौ बिलियन डॉलर की इंडस्ट्री भरभरा कर नीचे गिरती हुई सी लगती है दिमाग में इस तरह के जोक देखकर, ताश के पत्तों के महल की तरह.

met_770_050919025053.jpgपॉप सिंगर लेडी गागा ने जो ड्रेस पहनी, उसे देख कर लोग असल में चौंक गए. उन्होंने तीन ड्रेसेज बदलीं, चलते चलते.

‘मैं फैशन करती नहीं, मैं फैशन हूं’- कोको शनेल.

जब प्रियंका चोपड़ा MET गाला में पहुंचीं, उन पर मीम बनने शुरू हो गए. ठीक है, ह्यूमर के बिना जिन्दगी की नैय्या कहां ही पार लगेगी. डॉनल्ड ट्रंप के बालों और उनकी रेड टाई पर जोक बनाकर न जाने कितने कमीडीयन यूट्यूब पर छा गए. लेकिन जिस MET गाला में इस तरह के कपड़े पहन कर सेलेब्रिटी जाते हों, वहां कुछ न कुछ तो मतलब होगा ही इसका.  यूं ही तो कोई इस तरह कपड़े पहन कहीं नहीं पहुंच जाएगा. तो ये बात हमें लेकर जाती है हमारे पिछले सवाल की ओर. कि फैशन जब सड़कों पर उतरे, तो रनवे वाला फैशन क्या करे? वो ‘फैशन’ जिसे आर्ट कहा जाता है. वो फैशन जिसे डिजाइनर ट्रेंड सेट करने वाला कहते हैं. तो ये MET गाला है क्या जहां ये सब होता है?

billy-porter_770_050919025239.jpgएक से बढ़कर एक लुक देखने को मिलते हैं मेट गाला में, लेकिन इसके पीछे की वजह जो है वो अधिकतर लोग जानते नहीं, या कोशिश नहीं करते.

तो साहेबा, चल वहां जहां मिर्ज़ा.

मेट्रोपोलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट नाम की जगह है. अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में. ये म्यूजियम है एक. इसे ही MET कहते हैं शॉर्ट में. इसका अपना एक कॉस्टयूम डिपार्टमेंट है. इसको मेंटेन करने के लिए, चलाने के लिए, इनको फंड इकट्ठा करना होता है. अब हर घर जाकर चंदा इकट्ठा तो करेंगे नहीं. तो एक इवेंट रखते हैं हर साल. मई महीने के पहले सोमवार को. इसे कहा जाता है MET गाला. गाला बोले तो फंक्शन, पर्व, त्योहार. तो इसे फैशन का एक तरह का त्योहार समझ लीजिए. यहां आने के लिए बड़े बड़े स्टार महीनों पहले से तैयारी करते हैं. हर साल की एक थीम होती है. उसी थीम के हिसाब से लोग कपड़े पहन के आते हैं. जैसे पिछले साल की थीम थी हेवेनली बॉडीज. कैथलिक चर्च का जो असर रहा है दंतकथाओं में, पॉपुलर प्रतीकों में, उसको लेकर ये थीम रखी गई थी. पॉप सिंगर रिहाना पोप (ईसाईयों के धर्मगुरु) के जैसे कपड़े पहन कर आई थीं. प्रियंका मैरी (मरियम) की तरह सजकर गई थीं. उस पर भी मीम बने थे.

pri-met-main_770_050919025313.jpgये प्रियंका के अलग अलग लुक रहे. सबपे वो ट्रोल हुईं.

पर ये थीम का पंगा क्यों ही रखना? कोई कुछ भी पहन कर आए. फैशन तो फैशन है. अपरूप भोजन, पररूप श्रृंगार. बस, यहीं से शुरू होती है असली कहानी. वोग (Vogue) मैगजीन का नाम सुना होगा आपने. इसके कवर पर आना मतलब दुनिया में नाम कमा लेना. फैशन की मैगजीन है. पिछले तीन दशकों से ऐना विन्टूर (Anna Wintour) इसकी एडिटर हैं. 1988 में इस मैगजीन की एडिटर बनीं. MET गाला जो होता है, वो इन्हीं की देखरेख में होता है. 1995 से वही इसके सभी महत्वपूर्ण फैसले ले रही हैं. कौन आएगा, कौन नहीं, क्या थीम होगी, कौन क्या पहनेगा तक इनकी बात का वजन होता है. हर साल फैशन की दुनिया के मानकों और महत्वपूर्ण मील के पत्थरों को याद करने और उनको लेकर एक्सपेरिमेंट करने की कोशिश में थीम रखी जाती है. उन कामों को हाईलाईट किया जाता है जिन्होंने फैशन की दुनिया को नई दिशा दी. मानकों को चुनौती दी. नए ट्रेंड सेट किए. या जिनका असर लोगों के ऊपर बेहद गहरा पड़ा. इस बार की थीम थी कैम्प (Camp). इस कैम्प का मतलब जंगल में जाकर तम्बू गाड़ना नहीं होता. ये फैशन का एक टर्म है. इसका मतलब होता है हर सीमारेखा से परे निकलने वाला फैशन. जिसमें खूब सारी नाटकीयता हो. यानी ड्रामा. इमेजिनेशन. लीक से परे हटकर चलने वाला सब कुछ.

camp-fashion_770_050919025343.jpgकैम्प फैशन का एक उदाहरण. तस्वीर: ट्विटर

इस थीम का आईडिया लिया गया सूज़न सोंटैग के एक निबंध से. जो उन्होंने 1964 में लिखा था. कैम्प: नोट्स ऑन फैशन. अपने इस निबंध में सूज़न लिखती हैं कि कैम्प के बारे में बात करना उसके साथ विश्वासघात करने जैसा है. ‘To talk about Camp is therefore to betray it.’ लेकिन उनके नोट्स में जो बात सामने आती है वो ये है कि कैम्प फैशन एक लहजा है दुनिया को देखने का. एक नजरिया है. इस नज़रिए वो सबकुछ है जो दिखाई देते हुए भी वो नहीं है जो उसे होना चाहिए. तय मापदंडों से कहीं परे. आंखें जिसकी अभ्यस्त हों, उससे कहीं आगे.

wintour-chanel_770_050919025551.jpgइस वाट मेट गाला की जिम्मेदारी इन्हीं के कन्धों पर है- ऐना विन्टूर .

अपने निबंध में सूज़न लिखती हैं,

कैम्प को वस्तुओं और व्यक्तियों में देखना ये समझना है कि जो है उसका होना ही एक किरदार का निभना है. वो होते हुए एक किरदार निभा रहा है. संवेदना के स्तर पर ये जीवन एक रंगमंच वाले मुहावरे का सबसे सुदूर छोर है.

इसीलिए ड्रामा. नाटकीयता. सिंगर केटी पेरी का झूमर बनकर आना. जैरेड लेटो का अपना ही सिर लेकर घूमना. सब कुछ इस मेट गाला का हिस्सा था.

प्रियंका का ‘अतरंगी’ लुक भी.

met-dip-pri_770_050919025445.jpgप्रियंका के लुक को लेकर चर्चा हुई. दीपिका को डिज्नी प्रिंसेस जैसा कहा गया. वो उतनी ट्रोल नहीं हुईं. क्योंकि उनका पहनावा शायद फिर भी 'कॉमन सेंसिबिलिटी' के तहत स्वीकार्य था.

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले. चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले.

आंखों के नीचे सफ़ेद लाइनर. वाइन के रंग की लिपस्टिक. बिखरे-बिखरे बाल. बालों के ऊपर लंबा सा ताज. कुछ ऐसे ही सजकर आई थीं प्रियंका मेट गाला में. कई लोगों ने उनके इस लुक को मैड हैटर (Mad Hatter) से प्रेरित बताया. जब कैम्प की बात करते हैं, उसमें मैड हैटर की बात करना तर्कसंगत भी लगता है. हालांकि ये प्रियंका या उनकी टीम ने साफ़ नहीं किया कि उनका लुक किससे प्रेरित है. लेकिन मैड हैटर की बात चल ही गई है, तो उसके बारे में बात किए बिना आगे कैसे बढ़ा जाए.

एलिस इन वंडरलैंड नाम की एक किताब है. लूईस कैरल ने लिखी है. इस में एक बच्ची एलिस अपने सपने में एक ऐसी दुनिया में पहुंच जाती है जहां सब कुछ अजीबोगरीब है. इसी अजीबोगरीब दुनिया का एक किरदार है- द हैटर. मैड हैटर नाम लूईस ने उसे नहीं दिया था. वो किरदार काफी घमंडी-सा होता है. अकबकाया-सा रहता है. पहेलियों में बात करता है. चाय पीता रहता है. मैड एज अ हैटर पहले भी कहा जाता रहा था. बात हो रही है उन्नीसवीं सदी की. 1830 के आस पास की. उस समय जो लोग हैट बनाते थे, उनका नाम पड़ा हैटर. फेल्ट कैप बनाने में पारे (Mercury) का इस्तेमाल होता था. ये क्वीन विक्टोरिया का समय था. जो लोग टेक्सटाइल इंडस्ट्री में काम करते थे उनके ऊपर काम का दबाव बहुत था, आमदनी कम. इसलिए भुखमरी वाली हालत होती थी उनकी. ऊपर से पारे के असर की वजह से कामगारों के दिमाग पर असर पड़ता था. दिमाग को डैमेज होता था, बोलने में परेशानी हो जाती थी, जबान लड़खड़ाती थी. लूईस कैरल ने ये सब बड़े होते हुए देखा, और उसका असर उनके लेखन में भी आया. हालांकि  उन्होंने अपनी किताब में इस किरदार को जिस व्यक्ति से इंस्पिरेशन लेकर बनाया वो एक फर्नीचर डीलर थ, ऐसा बताते हैं. वो भी अपनी तरह का नमूना था, और हमेशा एक हैट पहने रहता था. उसका नाम कई जगह थियोफिलस कार्टर बताया गया है.

mad-hatter_770_050919025627.jpgमैड हैटर का किरदार अपने आप में एक पैरोडी है.

फिल्म में मैड हैटर का किरदार जॉनी डेप ने निभाया है. उनके इस लुक की वजह से कई लोगों ने प्रियंका चोपड़ा के साथ उनके मीम बनाए. हालांकि अगर ऐसा हो भी कि अगर उनसे इंस्पिरेशन ली गई हो, तो कैम्प की थीम में फिट बैठना कोई दूर की कौड़ी नहीं है. मैड हैटर का जो किरदार है वो अपने-आप में एक पैरोडी है. जिस समय एलिस इन वंडरलैंड लिखी गई थी, उस समय विक्टोरियन तौर-तरीके फॉलो करना काफी ज़रूरी सा माना जाता था. लेकिन लूईस कैरल उन सबका मज़ाक उड़ाते थे. एलिस इन वंडरलैंड में एलिस मैड हैटर और उसके साथ के खरगोश (मार्च हेयर) से मिलती है, तो पता चलता है कि सब कुछ यहां बिल्कुल उल्टा-पुल्टा है. किताब में इस चैप्टर का नाम ‘अ मैड टी पार्टी’ है. आम तौर पर टी पार्टी घरों के अन्दर हुआ करती थीं. घर की मालकिन उन्हें होस्ट किया करती थी. या घर की महिलाएं मिलाकर. लेकिन यहां मैड हैटर और मार्च हेयर चाय पी रहे होते हैं. घड़ी की सूई 6 पर अटकी होती है. समाज के उस समय के सलीकों का खुल्लम-खुल्ला मज़ाक उड़ाते हैं लूईस कैरल.

पैरोडी. नाटकीयता. विडंबना. लार्जर दैन लाइफ.

ezra-miller--burberry_770_050919030201.jpgएज्रा मिलर को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तरह की नाटकीयता की बात हो रही है

कैम्प की परिभाषा और उसकी समझ के बेहद करीब बैठता है ये किरदार वैसे भी. तो अगर प्रियंका का लुक उससे प्रेरित हो भी, तो समझ आता है.

एक और बेहद ज़रूरी बात तो इस मेट गाला में दिखी, वो थी पुरुषों और स्त्रियों के कपड़ों के बीच की रेखा का धुंधला जाना. ये भी कैम्प फैशन का एक महत्वपूर्ण पहलू है. एंड्रोजिनी यानी उभयलिंगी होने की स्थिति फैशन में किस तरह उभर कर सामने आती है, वो भी इस मेट गाला में दिखाई दिया. सूज़न लिखती हैं कि सेक्सुअल ऐट्रेक्टिवनेस याने यौन आकर्षकता का सबसे परिष्कृत रूप स्वयं के लिंग के मूल के विरुद्ध जाने में है. तगड़े मर्दाना पुरुषों में जो सबसे खूबसूरत है वो कुछ स्त्रैण है, फेमिनिन है. और नाज़ुक, फेमिनिन महिलाओं में जो सबसे खूबसूरत है वो कुछ मैस्कुलिन है, मर्दाना है. अपने इस निबन्ध में सूज़न मूवी स्टार्स का उदाहरण देती हैं.

harry-styles-gucci_770_050919030103.jpgवन डिरेक्शन बैंड के मशहूर सिंगर हैरी स्टाइल्स ने एंड्रोजिनस कपड़े पहने. इनका फ्रिल टॉप लोगों को बहुत पसंद आया.

'चीजें तब कैम्पी (campy-कैम्प जैसी) नहीं होती जब वो पुरानी हो जाती हैं, बल्कि तब होती हैं जब हम उनमें लिप्त होना कम कर देते हैं, और उस कोशिश के असफल होने का मजा ले पाते हैं, उस पर चिड़चिड़े हुए बिना'- Susan Sontag.

अगले साल तक का इंतज़ार करिए, मीम बनाने के लिए. एक और नई थीम देख पाने के लिए.

 

लगातार ऑडनारी खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करे      

Copyright © 2019 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today. India Today Group