लोकसभा 'भंग' कैसे हो जाती है?

उस समय सरकार कौन चलाता है?

प्रेरणा प्रथम प्रेरणा प्रथम
अप्रैल 14, 2019

आप पढ़ रहे हैं हमारी ख़ास सीरीज : लोकतंत्र. 2019 के लोकसभा चुनाव नज़दीक हैं. हर तरफ आप कोई-न-कोई खबर पढ़ रहे हैं. चुनाव से जुड़ी. इलेक्शन कमीशन से जुड़ी. चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी. कई शब्द होंगे जो हम और आप लगातार सुनते हैं. इस्तेमाल होते हुए देखते हैं. लेकिन उनका सही मतलब किसी को पता नहीं होता. होता भी है तो उसे हम एक्सप्लेन नहीं कर पाते. या ठीक-ठीक उसका महत्त्व क्या है वो हमें मालूम नहीं होता.

इसलिए हम इस ख़ास सीरीज में डेमोक्रेसी यानी लोकतंत्र से जुड़ी चीज़ों पर बात करेंगे. महत्वपूर्ण टॉपिक्स पर. जिनको लेकर हमारी समझ बेहतर हो सकती है. आज का टॉपिक है- लोकसभा भंग कैसे होती है, इसका क्या मतलब है?

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लोकसभा यानी लोअर हाउस. हाउस ऑफ़ पीपल्स. जहां चुन कर प्रतिनिधि जाते हैं. जनता सीधे तौर पर चुनती है उनको. लोकसभा और राज्यसभा में सिर्फ लोकसभा ही भंग की जा सकती है. भंग होने का मतलब क्या है लेकिन?

  1. एक तो अपने पांच साल पूरे करके लोकसभा खुद ही भंग हो जाती है यानी उसका कार्यकाल खत्म हो जाता है. दुबारा इलेक्शन होते हैं. नई लोकसभा बनती है.
  2. अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले लोकसभा भंग की जा सकती है. इसके भी अलग-अलग तरीके हैं.

कैसे होती है लोकसभा अपने कार्यकाल के खत्म होने से पहले भंग?

या तो राष्ट्रपति को पीएम सलाह दें, और लोकसभा भंग कर दी जाए राष्ट्रपति के आदेश पर. या फिर जो सरकार है, उसका बहुमत चला जाए. यानी मेजोरिटी चली जाए. ऐसे में प्रेजिडेंट के ऊपर ये जिम्मेदारी होती है कि वो दूसरी पार्टी को अपना बहुमत साबित करने का न्योता दें. और सरकार बनाने की जिम्मेदारी फिर उनकी होती. लेकिन अगर ऐसा नहीं  होता, तो फिर मामला इलेक्शन कमीशन के पास जाता है.

इलेक्शन कमीशन जल्द-से-जल्द नए चुनावों की घोषणा करता है. टाइम टेबल बनाता है. फिर चुनाव होते हैं, और नई लोकसभा का गठन होता है. क्योंकि छह महीने के भीतर नई सरकार का बनना ज़रूरी है.

loksabha-2_041419032854.jpgसाल में दो बार संसद का बैठना अनिवार्य है. यानी छह महीने के भीतर नई सरकार का गठन एकदम ज़रूरी होता है.

जब लोकसभा भंग होती है, और नई बनने में समय लगता है, तब तक सरकार कैसे चलती है?

जब तक नई सरकार नहीं बन जाती, पुरानी सरकार केयरटेकर गवर्नमेंट का काम करती है.

जो बिल वगैरह पेश हुए होते हैं लोकसभा में, भंग होने के बाद उनका क्या होता है?

ये थोड़ा टेक्निकल सवाल है. इसका कोई एक जवाब नहीं है. वैसे तो लैप्स हो जाते हैं बिल, लेकिन कुछ-कुछ केसेज में ऐसा नहीं होता. जैसे:

लोकसभा भंग होती है,जितने बिल, मोशन, नोटिस, पेटिशन वगैरह पेंडिंग होते हैं वो सभी लैप्स हो जाते हैं. 

लेकिन अगर कोई बिल दोनों सदनों से पास हो चुका है, और केवल राष्ट्रपति के पास अप्रूवल के लिए रुका है, तो वो लैप्स नहीं होगा. यानी कि वैध रहेगा.

राज्य सभा में पेश किया गया और वहीं पर पेंडिंग रुका हुआ बिल लोकसभा के भंग होने पर भी अवैध नहीं माना जाएगा, वैध बना रहेगा.

अब मान लीजिए कोई बिल लोक सभा राज्य सभा दोनों में पास हो चुका है. राष्ट्रपति को भी भेजा जा चुका है. लेकिन राष्ट्रपति ने कहा नहीं इसमें बदलाव करो. फिर लाओ. लेकिन तब तक लोकसभा भंग हो गई. तो ऐसी हालत में वो बिल भी लैप्स नहीं होगा. वैध बना रहेगा.

अब लोकसभा पांच साल से पहले ही भंग हो गई. नए चुनाव होने हैं. इलेक्शन कमीशन को सभी पार्टियों को टाइम तो देना पड़ेगा लेकिन. क्योंकि नॉमिनेशन फाइल करने होते. कैम्पेनिंग करनी होती. इन सबमें लगभग डेढ़ महीने का वक़्त लग जाता है.

अब ये बिल क्या होते हैं? कैसे पास होते हैं. मनी बिल क्या होता? जनरल बिल क्या होता? आर्डिनेंस क्या है, अंतर क्या होता? तकनीकी पहलू क्या है, ये अगली कड़ी में.  

 

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