संसद में पेश होने वाला बिल होता क्या है और पास कैसे किया जाता है

जानिए कैसे बनता है अपने देश में कानून

प्रेरणा प्रथम प्रेरणा प्रथम
अप्रैल 15, 2019

आप पढ़ रहे हैं हमारी ख़ास सीरीज : लोकतंत्र. 2019 के लोकसभा चुनाव नज़दीक हैं. हर तरफ आप कोई-न-कोई खबर पढ़ रहे हैं. चुनाव से जुड़ी. इलेक्शन कमीशन से जुड़ी. चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी. कई शब्द होंगे जो हम और आप लगातार सुनते हैं. इस्तेमाल होते हुए देखते हैं. लेकिन उनका सही मतलब किसी को पता नहीं होता. होता भी है तो उसे हम एक्सप्लेन नहीं कर पाते. या ठीक-ठीक उसका महत्त्व क्या है वो हमें मालूम नहीं होता.

इसलिए हम इस ख़ास सीरीज में डेमोक्रेसी यानी लोकतंत्र से जुड़ी चीज़ों पर बात करेंगे. महत्वपूर्ण टॉपिक्स पर. जिनको लेकर हमारी समझ बेहतर हो सकती है. आज का टॉपिक है-  ये जो बिल पेश किए जाते हैं, उनको पास कैसे किया जाता है. कानून कैसे बनता है.

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विधायिका यानी legislature जब कोई कानून बनाना चाहती है तो विधेयक पेश करती है. इसे बिल (Bill) कहा जाता है. ये सबसे शुरूआती फॉर्म होता है किसी भी कानून का. इस पर बहस होती है.

दो तरह के बिल यानी विधेयक होते हैं.

सामान्य बिल और आर्थिक बिल. आर्थिक बिल या मनी (Money) बिल (धन विधेयक) सिर्फ लोक सभा में पेश किया जा सकता है. ये पैसों से जुड़े कानून, आर्थिक मामलों से जुड़े मुद्दों वाले कानून का बिल होता है. सामान्य बिल किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में पेश किया जा सकता है. इस पर बहस होती है. बदलाव होते हैं. एक सदन से पास होकर वो दूसरे सदन में चला जाता है. वहां भी पास हो गया तो वो बिल अध्यादेश बन जाता है. उसके बाद उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है. अगर राष्ट्रपति ने भी उस पर दस्तखत कर दिए, तो वो कानून बन जाता है. अधिनियम. Act.

पास होने की प्रक्रिया क्या है?

अगर बिल लोकसभा में  पेश होता है तो स्पीकर डिसाइड करेंगे कि ये धन विधेयक है या साधारण विधेयक. राज्यसभा में अगर बिल पेश हो तो चेयरमैन ये डिसीजन लेंगे. फिर बिल अलग अलग रीडिंग से गुजरता है. उस पर बहस होती है. तीसरी रीडिंग के बाद अगर बिल पास हुआ तो दूसरे सदन में भेज दिया जाता है. बिल पास करने के लिए ध्वनि मत (वौइस वोट) और साधारण वोट दोनों का इस्तेमाल किया जा सकता है. 

modi-loksabha-750x500_041519030448.jpgसांकेतिक तस्वीर: ट्विटर

अगर दोनों सदन सेशन में ना हों, यानी चल ना रहे हों, और कानून बनाने की सख्त ज़रूरत पड़ जाए, तो केंद्र सरकार अध्यादेश ला सकती है. उसे राष्ट्रपति के सामने पेश कर सकती है. अगर राष्ट्रपति उस पर दस्तखत कर दें तो उसकी अहमियत अधिनियम (Act ) जितनी हो जाती है. लेकिन इसमें एक पेंच है. जैसे ही संसद का सेशन शुरु होता है वैसे ही उसे पेश करना होगा. जैसे लोकसभा में ये पास हो चुका है. राज्य सभा का सेशन (सत्र) शुरू होने के छह हफ्ते के भीतर इसे पेश करना ज़रूरी है वरना ये लैप्स हो जाएगा. अवैध करार दे दिया जाएगा.

 

अगली कड़ी में, पढ़िए क्या होते हैं 'उपचुनाव' या बाईपोल (Bypoll).

 

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