क्या है POCSO एक्ट, जिसके तहत कठुआ गैंगरेप जैसे अपराध में मिलती है तेज़ और सख्त सज़ा

कठुआ में 8 साल की मासूम के दोषियों को मिल चुकी है सख्त सज़ा.

ऑडनारी ऑडनारी
जून 10, 2019
फोटो कर्टसी : रॉयटर्स

ये स्टोरी साल 2018 में कुमारी प्रेरणा से ऑडनारी के लिए लिखी थी. हम उसे संशोधित कर आपको पढ़वा रहे हैं.


10 जनवरी, 2018. कठुआ में एक बच्ची को उसके घर से किडनैप किया गया. 12 जनवरी को उसके पिता ने पुलिस में बच्ची की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई. 17 जनवरी को उसकी लाश गांव के करीब एक जंगल में मिली. अप्रैल में जब मामला सामने आया, चार्जशीट में लिखा था-

'बच्ची को किडनैप करके एक स्थानीय मंदिर में बंधक बनाकर रखा गया. चार दिनों तक उसे नशे की गोलियां दी गईं. इस दौरान उसका कई बार रेप किया गया. अलग-अलग लोगों ने उसके साथ रेप किया. और आखिर में उसे मारकर फेंक दिया गया. रेप के सबूत मिटाने के लिए हत्या के बाद आरोपियों ने बच्ची को नहलाकर उसके कपड़े भी धोए थे.'

एक साल से ज्यादा चले इस केस में 10 जून 2019 को वर्डिक्ट आ गया है. 

कोर्ट ने मास्टरमाइंड सांजी राम समेत 6 लोगों को दोषी करार दिया है. सभी आरोपियों को आईपीसी की धारा 201 (सबूत मिटाने), 376 (रेप), 120 बी और धारा 302 (मर्डर) के तहत दोषी पाया गया है.

कोर्ट ने तीन लोगों को उम्रकैद की सजा दी है. बाकी तीन को 5 साल की सजा हुई है. 

जिन लोगों को उम्रकैद की सजा हुई है, उनके नाम ये हैं- ग्राम प्रधान सांजी राम (मुख्य आरोपी), स्पेशल पुलिस ऑफिसर दीपक खजुरिया, रसाना गांव का रहने वाला परवेश. जिन लोगों को पांच साल की  सजा हुई वो हैं- असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर तिलक राज, असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर आनंद दत्ता और पुलिस ऑफिसर सुरेंद्र कुमार. 

ये तो हैं केस के तथ्य. अब हम आपको बताने जा रहे हैं उस एक्ट के बारे में जिसके चलते इन आरोपियों को तेज़ और कड़ी सज़ा दे पाना मुमकिन हो पाया. एक्ट को कहते हैं पॉक्सो.  

क्या है पॉक्सो एक्ट?

सबसे पहले ये समझें कि ये (POCSO) पॉक्सो है. (POSCO) पॉस्को नहीं. ये बताना इसलिए ज़रूरी था क्योंकि लोग अक्सर पॉक्सो एक्ट को पॉस्को बोलते या लिखते हैं. POSCO एक स्टील कंपनी है. जबकि POCSO (Protection Of Children From Sexual Offence Act ) यानी लैंगिक उत्पीड़न से बच्चों के संरक्षण का अधिनियम. और हम यहां इसी एक्ट की बात कर रहे हैं.

बच्चों के साथ होने वाले यौन शोषण के लगातार बढ़ते मामलों को रोकने के लिए साल 2012 में केन्द्र सरकार ने पॉक्सो एक्ट को पास किया. इसके तहत नाबालिग बच्चों(लड़का-लड़की दोनों) के साथ होने वाले यौन अपराध में कार्रवाई के साथ-साथ बच्चों को सेक्शुएल हैरेसमेंट, सेक्शुअल असॉल्ट और पोर्नोग्राफी जैसे गंभीर अपराधों से सुरक्षा मिलती है. इस एक्ट के अंतर्गत अलग-अलग अपराध के लिए अलग-अलग सजा तय की जाती है.

पॉक्सो एक्ट की कुछ महत्वपूर्ण धाराएं

धारा-3: इसके तहत 'पेनेट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट' को परिभाषित किया गया है. अगर कोई शख्स किसी बच्चे के शरीर के किसी भी हिस्से में अपना प्राइवेट पार्ट डालता है या फिर कोई ऑब्जेक्ट डालता है. या फिर बच्चों को किसी और के या ख़ुद के साथ ऐसा करने के लिए कहता है तो यह सेक्शन-3 के तहत अपराध की श्रेणी में आता है. इसके लिए धारा-4 में सजा लिखी है. सजा के तौर पर मुजरिम को कम से कम 7 साल और ज़्यादा से ज़्यादा उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान किया गया है.

धारा-6: पॉक्सो एक्ट की धारा 6 में वे मामले आते हैं, जिनमें बच्चों को यौन उत्पीड़न के बाद चोट पहुंचाई गई हो. इसमें दस साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है और साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

धारा-7: इसके तहत 'सेक्शुअल असॉल्ट' को परिभाषित किया गया है. अगर कोई शख्स किसी बच्चे के प्राइवेट पार्ट को टच करता है या अपने प्राइवेट पार्ट को बच्चे से टच कराता है तो सजा के तौर पर धारा-8 के तहत 3 साल से लेकर 5 साल तक कैद हो सकती है.

धारा-11: बच्चों के साथ सेक्शुअल हैरेसमेंट को परिभाषित किया गया है. अगर कोई शख्स गलत नीयत से बच्चों के सामने सेक्शुअल हरकतें करता है, या उसे ऐसा करने को कहता है, पोर्नोग्राफी दिखाता है तो 3 साल तक कैद की सजा हो सकती है. वहीं अगर कोई शख्स किसी बच्चे का इस्तेमाल पोर्नोग्राफी के लिए करता है तो यह भी गंभीर अपराध है. ऐसे मामले में अपराधी को उम्रकैद हो सकती है.

इतने सख्त क़ानून होने के बावजूद क्यों पड़ी संशोधन की ज़रूरत?

ऐसे सख्त क़ानून होने के बावजूद इन 4 सालों में बच्चों के साथ होने वाली रेप की घटनाओं में कोई कमी दर्ज़ नहीं की गई है. NCRB (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) के आंकड़े बताते हैं कि केवल साल 2016 में 'पॉक्सो एक्ट' के तहत बच्चों के साथ रेप के 64,138 मामले दर्ज हुए थे. जब बीते साल कठुआ में नाबालिग बच्ची के साथ रेप की वीभत्स घटना सामने आई थी, दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालिवाल ने नाबालिगों से रेप मामले में फांसी की सजा की मांग करते हुए अनशन पर बैठ गई थीं.

मामले की संजीदगी को देखते हुए केंद्र सरकार ने पॉक्सो एक्ट 2012 में संशोधन को मंजूरी दे दी. इस नए क़ानून के तहत अगर रेप मामले में लड़की की उम्र 12 साल से कम होगी, तो रेपिस्ट को मौत की सजा दी जाएगी.

फोटो कर्टसी : रॉयटर्स फोटो कर्टसी : रॉयटर्स

अब आपको इस अध्यादेश के जरिए पॉक्सो एक्ट में हुए खास बदलाव के बारे में बताते हैं.

दोषी को कड़ी से कड़ी सजा देने का प्रावधान

-पहले महिलाओं से रेप की न्यूनतम सजा 7 साल की कैद थी, इसे बढ़ाकर 10 साल करने का प्रावधान है. सजा को उम्रकैद तक भी बढ़ाया जा सकता है.

- 16 साल से कम उम्र की लड़की से रेप पर न्यूनतम सजा को 10 साल से बढ़ाकर 20 साल कर दिया गया है. इसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है. वहीं गैंगरेप के मामले में दोषियों को आजीवन कारावास की सजा दी जाएगी.

- 12 साल से कम उम्र की बच्ची से रेप मामले में दोषी को कम से कम 20 साल या आजीवन कारावास या फांसी की सजा दी जाएगी. वहीं गैंगरेप के मामले में दोषियों को आजीवन कारावास या मौत की सजा दी जाएगी. रेप के हर मामले की जांच किसी भी हाल में 2 महीने के अंदर पूरी करने की बात कही गई है. इसके अलावा अपील और अन्य सुनवाई के लिए अधिकतम छह महीने का वक्त दिया जाएगा.

संशोधन में कहा गया

- अब 16 साल से कम उम्र की बच्ची से रेप या गैंगरेप के आरोपी के लिए अग्रिम जमानत का कोई प्रावधान नहीं होगा.कोर्ट और पब्लिक प्रॉसिक्यूशन को मज़बूत बनाने की होगी कोशिश.

- नए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया जाएगा.

- राज्यों में पब्लिक प्रॉसिक्यूटरों के लिए नए पद निकाले जाएंगे और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा.

- सभी पुलिस थानों और अस्पतालों में रेप मामलों के लिए विशेष फॉरेंसिक किट उपलब्ध कराए जाएंगे.

- रेप मामलों की तय समयसीमा में जांच के लिए पुलिस और अन्य स्टाफ की भूमिका तय की जाएगी.

- हर राज्य में रेप मामलों की जांच के लिए स्पेशल फॉरेंसिक लैब सेट अप किए जाएंगे.

- ये कदम नए मिशन मोड प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं जिसे तीन महीने के अंदर लॉन्च किया जाएगा.

इनमें से कितनी बातें फॉलो हो चुकी हैं, इसका हमारे पास ठीक-ठीक कोई डाटा नहीं  है. जो हमें दिख रहा है, वो ये कि पॉक्सो क़ानून में हुए इस संशोधन के बावजूद ऐसे मामलों में कोई कमी नहीं देखी गई है. बीते दो दिनों में ही देश के अलग-अलग हिस्सों से कमसेकम पांच केस सामने आए हैं. जिसमें बच्चों के साथ हिंसा और यौन हिंसा की गई है. 

हालांकि कई लोग सरकार के इस फैसले को रेप के मामलों में कमी लाने के कारगर तरीके के रूप में नहीं देखते. कैपिटल पनिशमेंट पर बहस कई साल पुरानी है और शायद हमेशा होती रहेगी.

 

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