फिल्म रिव्यू: What Will People Say

नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध ये फिल्म इतिहास रचने के बेहद करीब है

जो लड़कियां घर से भाग जाती हैं, उनकी क्या पहचान होती है?

क्या वो फुसफुसाहट में बदल जाती हैं? आस पड़ोस की शादियों में बना एक चटपटा मसाला जिसे आंटियां गोलगप्पे के साथ गटक जाती हैं, कुछ देर चुभलाती हैं, फिर रूमाल के कोनों से मुंह पोंछती कह देती हैं; छड्ड ना, सानू की.

एक कहती है, ‘उसने शायद सेक्स कर लिया था. अब खून मुंह लग जावे किसी के तो चाव थोड़ी उतरे है. भाग गई. घर पे ये सब थोड़े ही मिलता.’

दूसरी कहती, ‘गलती तो सवा सोलह आना मां बाप की है. लक्खन ना दीखे क्या लड़की के?’

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जितने मुंह उतनी बातें. इसी माहौल में पली बढ़ी लड़कियां अपनी मांओं के मुंह से ऐसी बातें सुनती हैं. सोचती हैं , वो कभी नहीं भागेंगी. वो बहुत अच्छी लड़कियां बनेंगी. वो इतनी अच्छी बीवी और बहू बनेंगी कि सब लोग उनको दुलराएंगे. सब अच्छी अच्छी बातें बोलेंगे. फिर वो बेस्ट बेटी बनने में लग जाती हैं. बिना पूछे कहीं जाती नहीं, कुछ बोलती नहीं, कुछ मांगती नहीं. बड़ी होती है, तो बेस्ट बीवी बनने में लग जाती हैं. बेस्ट बहू. समाज के हिसाब से चलने वाली. उनको अपनी जिन्दगी में कभी उन लड़कियों जैसा नहीं बनना जो भाग गई थीं. इसलिए वो सर झुकाए वो सब करती हैं जो उनके बाप कहते हैं. एक पॉइंट के बाद वो कंट्रोल सिस्टम पति के हाथ में चला जाता है. फिर वो सिर झुकाए उधर को चल देती हैं.

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गलत मत समझिए. इसमें गर्व ही गर्व होता है. समाज की आंखों में अपने लिए प्रशंसा देखकर फूली नहीं समाती ये लड़कियां. उनको स्वीकृति की आदत हो जाती है. रिजेक्शन उन्हें डराता है. उन्हें लगता है, जिस आधार पर उन्हें ‘अच्छी लड़की’ होने का टैग मिला है, वही छिन जाए तो क्या होगा. भय और गर्व का मिला जुला कॉकटेल बेहद नशीला होता जाता है. एडिक्टिव. लत लगाने वाला.

फिर एक दिन ऐसी लड़कियों में से ही किसी एक की बेटी भागने का फैसला कर लेती है.

कितने सालों की खीज उतर आती होगी नसों से बाहर? कितना गुस्सा उबलता होगा? उस मां का. उस बाप का. जिसे आदत हो गई है अपने हिसाब से बदलते लोगों की, उनकी हरकतों की. जब उस बाप के सामने वही बेटी खड़ी होकर कह दे कि उसे नहीं जाना उनके रास्ते. क्या उस बाप का गुस्सा उसके अन्दर के पितृत्व पर भारी पड़ सकता है? क्या एक लड़की की चुनौती उसकी जिंदगी से बड़ी हो सकती है? क्या एक मां और बेटी का रिश्ता बिना किसी तीसरे खम्भे के बिखर सकता है?

इन सभी सवालों को सामने रखती है- What Will People Say (Hva Vil Folk Si). नॉर्वे देश की एक फिल्म, जिसकी लीड में भारतीय एक्टर्स हैं. इसे डिरेक्ट किया है पाकिस्तानी मूल की नॉर्वेजियन डिरेक्टर इरम हक ने.

कहानी है एक पाकिस्तानी परिवार की जो नॉर्वे में बस गया है. आदिल हुसैन (मिर्ज़ा) और एकावली खन्ना(नजमा) की बेटी हैं मारिया मोज्देह (निशा). ये फिल्म इरम की असल जिंदगी से काफी मिलती जुलती है. फिल्म में निशा नॉर्वे में पैदा हुई लड़की है जिसके पेरेंट्स अपने पाकिस्तान को भूलना नहीं चाहते. वो इस कंफ्लिक्ट में बड़ी होती है. इरम को भी 14 साल की उम्र में उनके पेरेंट्स ने पाकिस्तान भेज दिया था. उस का उनके मन पर काफी गहरा असर पड़ा. ये फिल्म उनका दस्तावेज है बिताये गए उस समय का. झेले गए उस एक एक पल का.

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फिल्म नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध है. वहां देखी जा सकती है. नार्वेजियन भाषा में है, लेकिन सबटाइटल्स हैं. बीच में पाकिस्तान के सीन्स में हिंदी-उर्दू भी है, जो एक जानी पहचानी सी अनुभूति देती है. फिल्म के करीब ले जाती है ये बात. लगत है कुछ अपना सा देख रहे हों. कुछ विदेशी नहीं लगता.

देसी माता-पिता और सेक्स

पाकिस्तान का एक परिवार जो नॉर्वे में बसा है, उनकी बेटी नॉर्वे के रिवाजों के हिसाब से ढलती जाती है. उसके दोस्त वहीं के हैं, उसका अपना कल्चर उसे नॉर्वे का लगता है. उसके माता पिता खालिस पाकिस्तानी जड़ों को खुद में समोए आगे बढ़ रहे हैं. अपने बच्चों को साथ बनाए रखने की कोशिश में लगे हुए. लेकिन वो बच्चे बहुत आगे बढ़ गए हैं. इतने कि मां बाप को पीछे छूटने का डर सता रहा है. जब पहली बार मिर्ज़ा को पता चलता है कि उसकी बेटी अपने कमरे में अपने बॉयफ्रेंड के साथ थी, उसका रिएक्शन ये नहीं होता कि उसका बॉयफ्रेंड कैसे बन गया. या उसने सेक्स किया या नहीं. उसका रिएक्शन होता है कि निशा ने अगर अपने बॉयफ्रेंड के साथ सेक्स किया है, तो वो उसके साथ शादी भी कर ले. बदलते समय के साथ सेक्स को घिन की नज़र से देखने की अपनी आदत से दूर भागने की कोशिश कर तो रहे हैं पेरेंट्स, लेकिन उनसे ये हो नहीं पा रहा. कुछ है जो चिपक गया है तालू से, और छूट नहीं रहा.

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मां तो मां होती है, समझेगी ही?

नजमा का किरदार अपने आप में कई शेड्स लिए हुए है. मिर्ज़ा के ज़ोर देने पर वो नाच तो लेती है, लेकिन बाद में भुनभुनाती भी है कि उनकी जान-पहचान वाले क्या कहेंगे. बेटी बड़ी हो रही है. उसके बेराह चलने की चिंता अलग. वो बेराह चलना क्या है. लीक से हटना क्या है? वही जो उसने आज तक सीखा. पति से चार कदम पीछे चलने वाली पत्नीं. डर और जोर-ज़बरदस्ती को प्यार का नाम दे देना. कंट्रोल को दुलार समझना. चिंता का दूसरा नाम. बचपन से यही देख कर बड़ी होने वाली नजमा के पास और कोई दूसरी समझ ही नहीं है जो उसे अपने बेटी को एक अलग नजरिए से देखने में मदद कर सके. उसका गुस्सा इस वजह से बेटी पर निकलता है. क्योंकि उसकी बेटी उस जैसी नहीं हो पाई. उसका आगे निकलना चिंता और जलन, दोनों भावनाएं भड़का रहा होता है उसमें. उसी के साथ एकावली खन्ना एक बेहतरीन परफॉरमेंस दे जाती हैं. उनको और स्क्रीन टाइम मिलना चाहिए था.

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पिताओं का हारना ज़रूरी है, इसी में उनकी जीत होगी

आदिल हुसैन का किरदार इस किरदार में हर उस पिता जैसा है जो अपने हाथों से फिसलते कंट्रोल को खोने नहीं देना चाहते. वो पिता जिनको लगता है कि उनसे बेहतर कोई नहीं जानता. वो पिता जो नहीं जानते कि बरगद तले कोई पौधा फल फूल नहीं पाया है. वो बेहद मेहनत से कोशिश करते हैं कि उनके तले बनी रहे उनकी बच्ची, लेकिन उसे निकलते देख आप खो देने की मजबूरी से भी आजाद नहीं वो. निशा का बार बार भागना उन्हें यही एहसास दिलाता है कि कुछ तो है जिसे वो कंट्रोल नहीं कर पा रहे. जिससे उन्हें छुड़ा लेना चाहिए अपने बेटी को. पाकिस्तान भेजना एक बेहद आसान तरीका लगता है उन्हें. लेकिन जब वो भी काम नहीं आता तब उन्हें चोट लगती है भीतर कहीं. उनका  बिलीफ सिस्टम चनका खाता सा लगता है. इतने दशकों से कोई चीज़ अपनी समझी हो, और आपकी बेटी के हलके से धक्के से वो चूर चूर होती हुई नजर आये तो आप किस पर सवाल उठाएंगे? अपने विश्वास पर या अपने ही खून पर? इस धर्मसंकट में पड़े मिर्ज़ा को लगता है कि उसकी बेटी से छूट जाना शायद मददगार साबित होगा. लेकिन ऐसा नहीं होता.  

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फिल्म का अंत वैसा नहीं है जैसा कोई सोचता होगा. जैसे कोई धीमे से हाथ छुड़ाकर चला जाए, और आप एकटक देखते रह जाएं कहीं. ऐसी जगह जहां का आपको ध्यान भी ना रहा हो. फिल का अंत एक ऐसे नोट पर होता है जहां से आगे जाने की अनंत संभावनाएं हैं. एक आखिरी कोशिश में निशा पूरा जोर लगाती है, और छिटक जाती है दूर. उसे वापिस लाने का मौका है मिर्ज़ा का पास. लेकिन उन्हें अब फर्क नहीं पड़ता. उन्हें समझ आ गया है कि उनकी बेटी को बांध कर वो उसे अच्छी बेटी नहीं बना पाएंगे. इसकी पहली झलक उनके चेहरे पर तब दिखाई देती है जब निशा की शादी की बात चलती है और लड़के वालों द्वारा शादी के बाद उसे पढ़ने और जॉब करने के लिए मना कर दिया जाता है. उस समय कुछ टूट जाता है मिर्ज़ा के अन्दर, और ये उनकी आंखों में देखा जा सकता है. इस फिल्म का कोई सुखद अंत नहीं है. इस बात पर निर्भर है कि आपके लिए ‘सुखद’ की परिभाषा क्या है.

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पूरी फिल्म परत दर परत जैसी खुलती है, वो देखने वाले को अपने लपेटे में लिए बिना नहीं छोडती, और वो किसी भी फिल्म की सब्सी बड़ी सफलताओं में से एक है. Hva Vil Folk Si इस मामले में सफल है.

 

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