जब बहन को पटाने के लिए मोहल्ले के 'भिया' ने छोटे भाई से दोस्ती कर ली

'मैं बड़ी बहन को शोहदों से सेफ रखने के प्रेशर में बड़ा हुआ.'

ऑडनारी ऑडनारी
अगस्त 23, 2019
सांकेतिक फोटो

(ये ब्लॉग बनारस के रहने वाले हमारे एक रीडर का है. टीनेज में दीदी की सेफ्टी को लेकर खासे सजग रहते थे. उन्होंने उन ‘भियाओं’ को भी झेला है जो उनसे दोस्ती के बहाने दीदी के करीब आने की कोशिश करते थे)

मैं सातवीं क्लास में था. कोचिंग से घर लौट रहा था. इधर-उधर देखते हुए. घर से चार मकान दूर था कि नज़र एक बाल्कनी पर पड़ी. एक दीदी को उनकी बड़ी बहन मार रही थीं. मैं उनके घर चला गया और देखने लगा. इस पूरी घटना का लब्बोलुआब ये था कि बगल में एक भैया भी रहते थे. दीदी ने उनके बगीचे से गुलाब का फूल मंगा लिया था. बड़ी दीदी कह रही थीं कि तुमने फूल क्यों लिया? छोटी दीदी का कहना था कि सुबह से फूल दिख रहा था. सुंदर इतना था कि बस मन कर रहा था तोड़ लें. अंत में भैया से ही मांग ही लिया. लेकिन, गुलाब लेने और देने का इतना बड़ा मुद्दा बन गया कि छोटी दीदी की जमकर पिटाई हो गई.

तो हम लोग ऐसे ही समाज में बड़े हुए. यहां लड़कियों का पुरुष दोस्त होना, मतलब उसका ब्वॉयफ्रेंड होना मान लिया जाता है. लड़की अगर एक-दो लड़कों से बात करती है, तो कहा जाता है कि वह कैरेक्टर की ठीक नहीं है. तो हम लोगों के दिमाग में भी ऐसा ही था.

हां, घर से आधा किलोमीटर दूर बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी थी. दुनियाभर से बच्चे वहां पढ़ने आते थे. फिर शहर में एक स्टेट यूनिवर्सिटी, एक संस्कृत यूनिवर्सिटी, एक तिब्बती यूनिवर्सिटी और एक मुस्लिम यूनिवर्सिटी भी थी. ऐसे में यूनिवर्सिटी पहुंचे लड़के-लड़कियों में पढ़ाई का असर था. वहां लैंगिक समानता दिखने लगी थी. लेकिन, इस समानता का एक दूसरा पहलू ये था कि शहर के वो लड़के जो अपनी पढ़ाई के स्तर की वजह से यूनिवर्सिटी नहीं पहुंच पाते थे. उन्हें वो समानता अखरती थी.

पहले तो वे यूनिवर्सिटी के उन लड़कों को गरियाते थे. फिर उन्हें लगता था कि जिंदगी तो यूनिवर्सिटी वाले ही जी रहे हैं. ऐसे में वे मोहल्ले और आसपास की लड़कियों पर ‘ट्राई मारना’ शुरू कर देते थे. ट्राई मारना मतलब लड़कियों का पीछा करना, उन्हें ऊपर से नीचे तक देखना. वो जिस टाइम पर स्कूल-कॉलेज-कोचिंग जाती-आतीं, उसी टाइम पर गली के नुक्कड़ पर खड़े रहना. कुछ कमेंट कर देना. लड़की अपनी दोस्त से हंसते हुए बतियाते जा रही है तो 'हंसी तो फंसी' समझ चिट्ठी दे देना. घर के बाहर घंटों खड़ा रहना.

फिल्म रांझणा में धनुष का किरदार सोनम के किरदार से एकतरफा प्यार करता था. फिल्म की कहानी बनारस पर आधारित है. फिल्म का एक सीनफिल्म रांझणा में धनुष का किरदार सोनम के किरदार से एकतरफा प्यार करता था. फिल्म की कहानी बनारस पर आधारित है. फिल्म का एक सीन

इन सबके बाद भी निराश होने पर उनके पास 'नीम-हकीम' टाइप नुस्खा होता था. लड़की के छोटे भाई को पहले पटाना. उसे साथ में क्रिकेट खिलाना. पहले बैटिंग-बॉलिंग देना. उसकी किसी से लड़ाई हो तो उसका साथ देना टाइप. धीरे-धीरे वह छोटे भाई का 'भिया' बन जाता. ये भिया शब्द उस अबोध लड़के के लिए उस दौरान भइया-भाई से बड़ा होता था.

लेकिन छोटे भाई को धीरे-धीरे बातें समझ में आने लगतीं. वह अपनी दीदी के साथ मार्केट जाता तो देखता कि वही 'भिया' उसे पूरे रास्ते में बाइक से 5-7 बार उन लोगों को क्रॉस करते दिखते हैं. कभी बगल से जाते हैं तो कभी सामने से आते हैं. उसके घर के बाहर आकर उसे बुलाते हैं और फालतू की बातें करते हैं. लड़का समझने लगता कि उसका 'भिया' उससे तो बात कर रहा है, लेकिन उसकी नज़र घर के अंदर किसी को खोज रही है.

उसे लगने लगता कि वह 'भिया' उसकी दीदी को परेशान करने लगा है. ऐसे में वह भिया से दूरी बनाने लगता. वह उस भिया को अपने ऐटिट्यूड से हड़काने की भी कोशिश करता. लेकिन, 14 साल के लड़के और 24 साल के लड़के की शारीरिक ताकत में बड़ा फर्क होता है. कई बार वह लड़का मन मसोस कर रह जाता. कई बार वह पाता कि उस भिया के दोस्त भी उसकी बहन को देखने लगते. और मोहल्ले के दूसरे लड़के भी.

इन सबके बीच वह लड़का बहन को लेकर गंभीर हो जाता. बहन कहां जा रही है, कब जा रही है. कब आ रही है. उन सब पर नजर रखने लगता. उसे कौन परेशान कर रहा है, कौन पीछा कर रहा है, इन सबका एक खाका वह बनाकर रखता. जैसे-जैसे लड़का बड़ा होता है, उसका हौसला भी बढ़ता है. कुछ बढ़ती उम्र में आई ताकत से. और कुछ फिल्में देखकर. जिनमें बहन या हिरोइन को बचाने के लिए एक हीरो कई गुंडों से भिड़ जाता है.

धीरे-धीरे स्थितियां बदलती हैं. छोटा भाई 20 साल का होता है और जिसे वह भिया कहता था वह 30 के करीब. अब उसे लगता है कि वह अपनी बहन को ज्यादा सेफ रख सकता है. उसे लगता है कि लोग बस इतना जानेंगे कि वह उसकी बहन है तो देखेंगे भी नहीं. फिर बहन की शादी होती है और उसे लगता है कि अब तो ये बड़ा वाला टेंशन खत्म. ऐसी एक-दो नहीं दसियों कहानी से मेरा साबका रहा है. थोड़ा बहुत व्यक्तिगत अनुभव भी रहा है और थोड़ा दोस्त और समाज का. बाकी, चीजें अब बदल रही हैं, कितनी बदली हैं ये मुझसे ज्यादा एक छोटा भाई ही बता सकता है, जो इस समय किसी भिया के चक्कर में पड़ा होगा.

 

 

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