'दी', आप उन चुनिंदा अज़ीज़ रिश्तों में से हो, जिन्हें मैं खोना नहीं चाहती

एक दिन हम बीच रात अंधेरी सड़क पर आपके पसंद का श्रीदेवी का डांस जरूर करेंगे.

नेहा कश्यप नेहा कश्यप
अप्रैल 24, 2019

हमारे कॉलम 'रिश्ते' में आज हम श्रुति अग्रवाल की चिट्ठी आपके सामने ला रहे हैं. इन्होंने ये चिट्ठी अपनी ननद भावना के लिए फेसबुक पर लिखी. उनकी इजाज़त से उनकी यह पोस्ट हम आपको पढ़ा रहे हैं:

"आप और मैं चुंबक के उन दो टुकड़ों की तरह हैं, जो हैं बिलकुल विपरीत लेकिन रहते हमेशा साथ हैं. ननद-भौजाई की ऐसी जोड़ी कहीं नहीं होगी. हमारे रिश्ते में खट्टा, मीठा, नमकीन हर स्वाद है, नहीं है तो कड़वापन. आज भी जब दी किसी से मिलवाते समय कहती हैं, ये मेरी भाभी हैं, मैं हंस देती हूं और सामने वाले का चकराना तो बनता है..."

भावना दी, आपकी और मेरी कहानी 11 दिसंबर 2002 से शुरु होती है. उससे पहले हम मिलकर भी ना मिले थे. वो पहला दिन था, जब आप हाथ में हल्दी से भरा कटोरा लिए मेरी हल्दी की रस्म के बीच आई थीं. मेरे घर की एक बुजुर्ग महिला से कहा, भाई की उतरी हल्दी है, भाभी को लगाना है.

बुआ थी या चाची-ताई ध्यान नहीं, लेकिन उन्होंने चिल्ला कर कहा था, हल्दी भेजी है मोना के लिए. तनक सी लगाना, रंग गहरा है, असली ना होगी, देखना कछु नुकसान ना हो जाए. हमारी बिटिया का चेहरा खराब होगा. वो बुजुर्ग महिला तो रो में बोले जा रहे थीं. मैंने देखा राजीव जी (मेरे पति) की बहन के चेहरे पर से रंगत गायब हो रही है.

मैं और आप बिलकुल विपरीत हैं. ये शादी भी दो विपरीत परिवारों के बीच हो रही थी. मेरे घर की हर महिला घरेलू होते हुए भी मुखर, जॉब करने वाली मेरी सासू मां चुपचाप घर के पुरुषों के पीछे चलने वाली.

हल्दी का गहरा रंग अनजाने में ही आपके मन पर गहरी छाप छोड़ गया.

मैं समझ रही थी, लेकिन कंगन बांधने की रस्म के बीच एकाएक कुछ बोल ना पाई. उसके बाद सगाई-शादी में मैंने आपको थोड़ा खिंचा-खिंचा सा पाया. आप हर काम पूछ-पूछ कर धीरे से कर रही थीं. जहां मेरी दी और भाभी हर रस्म में सबसे आगे आप पीछे-पीछे.

दुल्हा-दुल्हन के भोज (सजन गोठ) के समय मुझे कुछ पल मिले थे, आपके साथ. उसमें जब मैंने आपसे कहा, पहला कौर आप खिलाओ. आपने तुरंत कहा मेरे हाथ से ग्रास खाओगी. हम दोनों मुस्कुरा उठे. आमीन आज हम दोनों के बीच यदि कुछ बचा है, तो यह मुस्कुराहट ही.

आपके घर गृहप्रवेश के बाद ही समझ आने लगा आपकी और मेरी परवरिश में अंतर ही नहीं, जमीन-आसमान का अंतर है.

मैं शादी के तीसरे दिन जींस-टॉप में बाहर जाने को तैयार थी, पता चला आपके भाई- मेरे पति ने आपको जींस पहने से मना कर दिया था. मुझे रात-बेरात अकेले काम करने की आदत थी. आपको अगली गली में जाने के लिए भी राजीव छोड़कर आते थे. ना जाने ऐसे कितने अंतर थे. आप साइंस लेकर भी घरेलू थीं.

मैं कामर्स औऱ आर्ट्स साइट की होकर भी हर फैसले में निर्णायक. फ्लैट का लोन, पर्सनल औऱ पेढ़ी से क्यों लिया, ब्याज की दर देखिए. यह इस तरह मैनेज हो जाएगा. बिना बाई घर कैसे चलेगा, मुझे तो घरेलू सहायिका चाहिए. मेरी जिंदगी का हर घंटा मेरे लिए जरूरी है. घर-बाहर दोनों के काम करते हुए मुझे मी-टाइम चाहिए.

ना जाने ऐसी कितनी बातें थीं, जो आपके औऱ सासू मां के लिए बिलकुल नई थीं. रही-सही कसर घर में पूजा के समय पूरी हो गई, जब गुड्डू आंटी ने मेरी बनाई पहली रसोई की खीर और पनीर की सब्जी की तारीफ करते हुए कह दिया भावना, आपकी बेटी चुन्नू को श्रुति की तरह बनाना.

आज मैं समझ सकती हूं दी. जब कोई कहता है आयुष राजीव की तरह दिखते हैं, तो ही चिढ़ जाती हूं. आपसे तो कहा गया, आप अपनी बेटी को श्रुति की तरह बना दीजिए. बस वक्त बीतता गया.

मैं समझती गई आप कांच की तरह साफ दिल की लड़की हो, जिस पर वक्त और अपनों ने जरूरत से ज्यादा बंदिशे लगाई हुई हैं. मैं दुनियावारी भाषा में आपको बहकाने लगी, ऐसे नहीं ऐसे करो दी, बर्तन और झाड़ू-पोंछे वाली तो लगा लो. सारा काम खुद करोगी तो खुद पर ध्यान कैसे दोगी. दूसरों के लिए नहीं खुद के लिए तैयार होकर रहना, संजना-संवरना शुरू करो. पैर में बिवाई, उफ्फ. कुछ समय बाद आपको जींस-पेंट और अजीब सी चीजें पहनाने वाली भी मैं ही थी.

वक्त के साथ धीरे-धीरे आप मुझे श्रुतु बोलने लगे. जबकि मुझे श्रुति नाम से इतना प्यार है कि इसे बिगाड़ने नहीं देती. श्रुति से श्रुतु तक का आपका सफर मुझसे ज्यादा जटिल रहा है, मेरी जिंदगी में रिश्तों की लंबी फेहरिस्त है, आपके पास चुनिंदा लोग.

मैं अंजाने को अपना बनाने में विश्वास करती थी. आप अपने ही भाई से दूर चले जाने का डर मन में लिए बैठी थीं, लेकिन आज आपके जन्मदिन पर मैं ये गर्व से कह सकती हूं कि राजीव जी के साथ जुड़कर मुझे जितने भी लोग मिले हैं, उनमें आप सबसे अनमोल हैं, मेरी तनीषा से भी ज्यादा मुझे आपसे प्यार है.

आईने के सामने खड़े होकर देखिए न, आप काफी कुछ मेरे जैसे हो गए हैं, मैं भी थोड़ी सी आपकी तरह हूं. देखो ना गुस्सा कम हो गया है, पहले से.

वैसे भी आप जानते हैं मैं गुस्से में चिल्लाती नहीं बस बात करना बंद कर देती हूं. आपसे तो कई बार लंबा अबोला रहा है, जानती हैं क्यों? क्योंकि मैं आपको कभी खोना नहीं चाहती. जिसे खोना नहीं चाहती उससे बात बंद कर देती हूं, ताकी गुस्से में कुछ गलत कहकर उसे खो ना दूं और आपको खोना किसी सूरत में मंजूर ही नहीं.

पिछले कुछ सालों में मैंने लगातार आपको बदलते देखा है. देखा है स्वाति भाटिया के अंदर छिपी भावना को बाहर निकलते अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए.

अब सबसे अच्छा लगता है जब आप घर आती हो और मेरी किताबों की दुनिया में से अपने लिए कुछ खास तलाशती हो. उस दिन आप मिल्कमेन का हिंदी वर्जन उठा रही थीं न. आज मैं आपको अपनी अमृताप्रीतम से भी मिलवाना चाहती हूं. इजाडोरा डंकन से भी.

सच दी बेहद खुश हूं. अब आप अपने अंदर की भावना को समझने लगी हो. पहचानने लगी हो, सबसे बढ़कर अपने आप को प्यार करने लगी हो. अब आप श्रुति की ननद नहीं, सिर्फ भावना हो. दो बेहद प्यारी-जहीन-समझदार बच्चियों को पंख देने वाली मां हो, मेरे लिए वह गोद हो जिसमें मैं सिर रखकर रो सकती हूं. जिसके पास जाकर मैं चिल्ला सकती हूं, मुझे भूख लगी है, अभी खाना है कुछ, वो भी मीठा.

दी मैं आपसे बेहद प्यार करती हूं.

हां, हमेशा की तरह राजीव जी से पहले राखी मुझे ही बांधना. एक दिन हम बीच रात अंधेरी सड़क पर आपके पसंद का श्रीदेवी का डांस जरूर करेंगे. मन का करने में जिससे किसी को नुकसान ना हो डरना क्या.

 

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