ससुराल वालों ने 7 साल में 7 बार अबॉर्शन कराया क्योंकि पेट में बेटी थी

offline
शादी के 10 साल में सुमति आठवीं बार प्रेगनेंट हुई है. लेकिन मां पहली बार बनेगी.

सुमति 31 साल की हैं. 21 साल की उम्र में उनकी शादी हुई थी. शादी के इन 10 सालों में सुमति आठवीं बार प्रेगनेंट हुई है. लेकिन मां पहली बार बनेगी. इससे पहले ससुराल वाले 7 बार उसका जबरन अबॉर्शन करवा चुके हैं. सिर्फ इसलिए कि उसके पेट में एक लड़की पल रही थी. इस बार वह मां बनेगी क्योंकि पेट में बेटा पल रहा है. 

उसके अबॉर्शन का सिलसिला तब शुरू हुआ जब वह पहली बार प्रेगनेंट हुई. तब वह 24 साल की थी. ससुराल वाले उसे क्लिनिक लेकर गए. उसके गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग परीक्षण किया गया. पता चला कि लड़की है. उसका अबॉर्शन करा दिया गया.

इसके बाद वो हर साल प्रेग्नेंट हुई. हर बार ससुराल वालों ने लिंग परीक्षण करवाया. बार-बार लड़की होने का पता चला. और हर बार उसका अबॉर्शन करवाया गया. जबरदस्ती. आठवीं बार लड़का होने का पता चला तो ससुराल वाले खुश हो गए. और सुमति का अबॉर्शन नहीं कराया गया.

हालांकि, सुमति गहरे डिप्रेशन और ट्रॉमा में हैं. उसका साइकेट्रिस्ट के पास इलाज भी चल रहा है. जब भी उसे पता चलता कि वो मां बनने वाली है वो खुश होने पहले ही डर जाती. कि शायद इस बार भी उससे उसका बच्चा छीन लिया जाएगा. 

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, बार-बार जबरदस्ती कराए गए अबॉर्शन की वजह से सुमति डिप्रेशन में चली गई है. वह रात को चौंककर उठ जाती है. रोने लगती है. बातें भी बेहद कम करती है. जब पड़ोसी और रिश्तेदार उसे बधाई देने आते हैं तो वो रोने लगती है. उसके मन में डर बैठ गया है कि उसका एक बार फिर अबॉर्शन करवा दिया जाएगा. जब लोग उन्हें याद दिलाते हैं कि इस बार ऐसा नहीं होगा, तब वह चुप होती है.

सांकेतिक तस्वीर : सोर्स- pixabay<>

एनबीटी की रिपोर्ट के मुताबिक, सुमति कहती है कि अच्छा हुआ उसका अबॉर्शन हो गया और वो बेटी को जन्म नहीं दे सकी. क्योंकि अगर वह एक बेटी को जन्म देती, तो शायद उसे भी उसी ट्रॉमा से गुजरना पड़ता, जो उसने झेला. वो कहती है, ‘मुझे अपनी बेटियों को उनके भाग्य पर छोड़ना पड़ता, जैसे मेरे मां-बाप ने मुझे मेरे भाग्य पर छोड़ दिया.’ सुमति कहती है कि वो अब कभी बेटी को जन्म देना नहीं चाहती.

इस मामले में हमने डॉक्टर जतिन चौधरी से बात की. उन्होंने बताया कि इस तरह के ट्रॉमा से निकलने में महिलाओं को 6 महीने से 3-4 साल तक लग जाते हैं. ट्रीटमेंट के दौरान दवाओं के साथ परिवार और दोस्तों का सपोर्ट बहुत अहम होता है. दवाएं लगातार हुए अबॉर्शन से असंतुलित हुए हार्मोंस को बैलेंस करते हैं, लेकिन थैरेपी और परिवार के प्यार से इससे उबरने में मदद मिलती है. योगा और मेडिटेशन भी इसमें मददगार साबित होता है.

ये भी पढ़ें- एक चिट्ठी नई-नवेली मम्मियों के नाम