बाइक और स्कूटी के विज्ञापनों में सबसे बड़ा झोल, जिससे हम बेवकूफ बन जाते हैं

और इसके बारे में कोई बात ही नहीं करता

जब हम स्कूल में थे, तब हमारे मैथ्स टीचर की बड़ी बेटी हमारे साथ बस में स्कूल आती-जाती थीं. हमारी सीनियर थीं. उनके पापा यानी हमारे सर बाइक (मोटरसाइकल) से स्कूल आते-जाते थे. कई बार बस के साथ भी जाते हुए दिख जाते. एक दिन हमने उन दीदी से पूछ लिया. आप सर के साथ बाइक से क्यों नहीं आतीं?

उन्होंने जवाब दिया.

ब्रेक तो लगाते नहीं. पैर से बाइक रोकते हैं. कहीं गिरा-पड़ा दिए तो?

इस बात पर सब हंस दिए थे.

क्योंकि जोक चलते हैं कि लड़कियां पैरों से स्कूटी रोक लेती हैं. लड़के तो माचोमैन की तरह ब्रेक लगाते हैं तो बाइक चीख उठती है. वैसे बाइक न रोकी तो क्या ख़ाक बाइकसवार हुए.

ये क्यों याद आया?

क्योंकि अभी-अभी अखबार में एक बड़ा सा ऐड देखा. बाइक का. ये रहा.

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लिखा है, #बीस्टमोड ऑन. बीस्ट मतलब जानवर. खूंखार. अपने सामने आने वाली किसी भी चीज़ को नोच खसोट कर बर्बाद कर देने वाला. एकदम जंगली.  

देखकर याद आ गए स्कूल वाले सर. जिन पर सब इसलिए हंसे थे क्योंकि वो बाइक से स्टंट नहीं करते थे. चुपचाप चलाते थे. शायद थोड़ा धीरे भी. लेकिन ये सब पुरुषों को शोभा नहीं देता न. लहरिया कट मारते. 90 की स्पीड से चलाते. तो शायद स्कूल के गरम खून वाले लड़कों की नज़र में इज्जत बढ़ जाती. फुसफुसा कर उन्हें स्कूटर चलाने की सलाह नहीं देते.

बाइक के जितने भी ऐड होते हैं. उन्हें कभी गौर से देखा है आपने? ऐसा दिखाते हैं कि मतलब इन्हें चलाने वाला बस अभी ही रोहित शेट्टी की फिल्म में स्टंट करने निकल जाएगा. या फिर सीधे बुद्धा सर्किट में पहुंचेगा और वर्ल्ड रेसिंग चैम्पियनशिप जीत लेगा. इनके प्रिंट ऐड्स से लेकर टीवी तक के विज्ञापनों तक में कीवर्ड होते हैं :

स्ट्रॉन्ग.

टफ.

मैस्कुलिन (मर्दाना).

पावरफुल.

चैलेंजिंग.

स्पीड.

डेंजर/डेंजरस

यकीन नहीं होता तो ये ऐड देख लीजिए. प्रिंट के कुछ ऐड्स हैं.

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ऐसा लगता है कि इन बाइक्स पर सवारी करने वाले सफर पर नहीं बल्कि किसी जंग के लिए निकले हों. वहां खूब खून-खराबा होगा और ये अपनी बाइक से पहुंचकर सबको मजा ही चखा देंगे. अपुन ही भगवान है टाइप फीलिंग आ जाएगी. ये बात और है कि इन बाइक्स की 90 फीसद ज़िन्दगी ट्रैफिक सिग्नलों में बीतने वाली है.

दिक्कत इस बात से नहीं है. इस बात से है कि पुरुषों को टारगेट करने वाले जितने भी प्रोडक्ट्स हैं, उन सबकी मार्केटिंग ऐसी ही होती है. चाहे बाइक हो या टेलकम पाउडर. पाउडर न हुआ, एवरेस्ट की चोटी पर पड़े पत्थर को पीसकर बनाया गया चूरा हो गया. जिसको लगाकर एकदम हीमैन बन जाएंगे. बिकिनी पहनी लड़कियां आके चिपट जाएंगी. वहीं, लड़की टेलकम पाउडर लगाएगी, तो आस-पास फूल खिल जाएंगे. लड़के पलट के मुस्कुराएंगे. बच्चे आके आस-पास चहचहायेंगे (चिड़िया दिखाने में क्या टाइम वेस्ट करना. मां की ममता वाला एंगल भी तो डालना है. खैर).

ये कुछ स्कूटी के ऐड हैं. स्कूटी के टीवी ऐड भी होते हैं तो फोकस होता है कि इनके कलर्स कितने सुन्दर हैं. या इनकी सीट कितनी कम्फर्टेबल है. इसमें स्टोरेज कितना ज्यादा है.  खुद ही देख लीजिए:

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मल्लब ठीक है तुम बाइक को थॉर का हथौड़ा बना दो. उससे बिजलियां गिरवा लो. उसको ऑप्टिमस प्राइम का छोटा भाई कहके बेच लो. माने पुरुषों के दिमाग न है? दो चक्के मिल गए तो पगला जाएंगे? बिल्डिंग से कूद जाएंगे? ट्रक पर बाइक दौड़ा लेंगे?  इसलिए अक्षय कुमार जब कोल्डड्रिंक का ऐड करते हैं तो उनसे ब्रूस ली और जैकी चैन टाइप स्टंट कराए जाते हैं. लेकिन जब कटरीना कैफ यही काम करती हैं तो ऐसा ऐड करवाया जाता है मानो अभी कोल्डड्रिंक की बोतल को गले से लगा उससे ब्याह रचा डालेंगी. पर हमें जे बताओ कि लड़कियों की स्कूटी को लॉलिपॉप के माफिक बेचने का क्या तुक है? स्कूटी न खरीद रही हों, दुपट्टा खरीद रही हों. काहे ले रहे?

बहन जी सुन्दर था. ले लिया.

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काम की चीज ठहरी. यहां से वहां जाने के लिए इस्तेमाल होती है. दोपहिया से वैसे भी आराम रहता है कि कहीं पतली गली से भी निकल जाओ. ट्रैफिक ज्यादा हो तो साइड में कहीं छांव में लगा लो. दो लोग हों तो उनके लिए बेस्ट. चाहे लड़का हो या लड़की. ट्यूशन दोनों जाएंगे. ऑफिस दोनों जाएंगे. घर दोनों को आना है. घूमने दोनों को जाना है. बस इतना सा काम है.

इसमें इतना जहर, पारा, जिनावर, अल्लम-गल्लम भरके लड़कों को क्या दिखाना चाहते हो? कि ये चलाएंगे तो सुपर क्रेजी कहलाएंगे? हीरो टाइप बन जाएंगे? लड़कियां मुग़ल गार्डेन खिला देंगी अपनी स्कूटी से जहां भी जाएंगी? तितली की तरह फड़फड़ाते हुए?

जानवर से आदमी बनने में सदियां लग गईं. तुम बेट्टा वापिस ही घसीट ल्यो, नहीं?  

 

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