अपनी बेटियों के लिए शाहिद आफरीदी की ये सोच बहुत दिक्कत वाली है

इस दुनिया में कई मर्द ऐसे हैं जो यही सोचते हैं.

फोटोः ट्विटर

बराबरी और आजादी. ये सिर्फ दो शब्द नहीं हैं. ये हक है इस दुनिया में रह रहे हर शख्स का. उतना ही जरूरी जितना कि सांस लेना. इस दुनिया की आधी आबादी दशकों से अपने इन्हीं दो अधिकारों को हासिल करने की लड़ाई लड़ रही है.

लेकिन कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें लगता है कि वे तय कर सकते हैं कि दूसरों को कितनी और क्या आजादी मिलनी चाहिए. उन्हीं में से एक हैं पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान शाहिद आफरीदी.

दरअसल, हाल ही में उनकी ऑटोबायोग्राफी ‘गेम चेंजर’ रिलीज हुई है. इसमें उन्होंने अपनी बेटियों के बारे में भी लिखा है. शाहिद की चार बेटियां हैं. अक्सा, अंशा, अज्वा और अस्मारा. अक्सा क्लास 10th में और अंशा क्लास 9th में है. शाहिद लिखते हैं कि दोनों पढ़ाई के साथ-साथ स्पोर्ट्स में बेहद अच्छी हैं. यहां तक तो सब ठीक ही है.

वह लिखते हैं-

‘उन्हें मेरी ‘परमिशन’ है कि वो कोई भी स्पोर्ट खेल सकती हैं, लेकिन खेल इनडोर होना चाहिए. क्रिकेट मेरी बेटियों के लिए नहीं है. उन्हें कोई भी इनडोर स्पोर्ट्स खेलने की अनुमति है. लेकिन मेरी बेटियां किसी भी पब्लिक स्पोर्ट एक्टिविटी में शामिल नहीं होंगी.’

शाहिद ने आगे लिखा, ‘मैंने सामाजिक और धार्मिक कारणों से यह फैसला किया है. उनकी मां की भी इसमें सहमति है. नारीवादियों को जो कहना है कहें. एक रूढ़िवादी पाकिस्तानी पिता होने के नाते मैंने अपना फैसला कर लिया है.’

शाहिद आफरीदीशाहिद आफरीदी

शाहिद ने अपनी किताब में जो लिखा है उसमें हो सकता है ऊपरी तौर पर किसी को कोई दिक्कत न लगे. कुछ लोग दलील भी देंगे कि एक पिता को पूरा हक है अपनी बेटियों या यूं कहें बच्चों के लिए फैसले लेने का. कुछ लोग इसे उनका निजी मामला भी कहेंगे. लेकिन समस्या की जड़ यही सोच है.

उनकी इस बात में कई दिक्कतें हैं-

क्या शाहिद का कोई बेटा होता तो क्या वह उसके लिए भी ऐसी ही कंडीशन रखते. कि जो खेलना है खेलो, लेकिन इंडोर गेम होना चाहिए. शायद नहीं. क्योंकि वो खुद भी आउटडोर गेम यानी क्रिकेट खेलते हैं. ऐसे में महिलाओं के प्रति अपनी रिग्रेसिव सोच को आफ्रीदी धर्म और समाज के पर्दे से छिपा नहीं सकते हैं. इतने बड़े सेलिब्रिटी का समाज की आड़ लेना भी समझ से परे ही है.

आफरीदी को लगता है कि वह अपनी पत्नी और बेटियों की जिंदगी के फैसले ले सकते हैं. समस्या इस सोच से है. क्या शाहिद की बेटियों का हक नहीं अपने लिये करियर चुनने का? ये तय करने का कि वो क्या करना चाहती हैं.

शाहिद आफरीदीशाहिद आफरीदी

थ्री इडियट, उड़ान जैसी फिल्में देखने के बाद बोमन ईरानी और रॉनित रॉय के किरदार हमें विलेन लगने लगते हैं. हमें अपने पैशन को जीना चाहिए. करियर वही चुनना चाहिए जो हम करना चाहते हैं. लेकिन जैसे ही बात करियर चुनने में लड़कियों की आजादी की बात आती है ज्यादातर लोग पिता का हक, पिता की जिम्मेदारी और आखिर में लड़कियों की सुरक्षा की दलील देकर चुप हो जाते हैं.

शाहिद अकेले नहीं हैं, इस दुनिया में कई मर्द ऐसे हैं जो यही सोचते हैं. उन्हें लगता है कि वे अपने बेटियों और पत्नियों के लिए क्या सही है, क्या गलत है इसका फैसला कर सकते हैं. लेकिन वे शाहिद जैसे सेलिब्रिटी नहीं हैं. वे शाहिद की तरह अपनी पिछड़ी सोच का बखान नहीं करते. या उनकी सोच से एक बड़ा तबका प्रभावित नहीं होता है.

लेकिन शाहिद आफरीदी एक क्रिकेट स्टार हैं, इंटरनेशनल आइकन हैं. लाखों लोग उन्हें आइडियलाइज करते हैं. उनके जैसा बनने का सपना भी देखते होंगे. ऐसे में शाहिद औरत को खुद से कमतर समझने वाली अपनी पिछड़ी सोच को उन लाखों लोगों के लिए भी परोस रहे हैं. कि ऐसा सोचने में कोई बुराई नहीं है. धर्म और समाज के नाम पर सब चलता है.

 

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