'हम तवायफों को हमारे काम ने नहीं लोगों की गंदी सोच ने बदनाम कर दिया'

कलाकार हैं लेकिन 'आदर्श' समाज का हिस्सा नहीं मानी जातीं.

कहते हैं, कलाकार सम्मान का भूखा होता है. लेकिन जिस समाज में हम रहते हैं वहां नाचने-गाने वाले कलाकारों को, खासतौर पर तवायफों को सम्मान की नजर से नहीं देखता. उनसे नफरत की जाती है. उनका अपमान किया जाता है. उन्हें तथाकथित सभ्य समाज का हिस्सा नहीं माना जाता है.

हमारी साथी वेबसाइट 'द लल्लनटॉप' की टीम इस वक्त चुनावी यात्रा पर है. इस टीम की रिपोर्टर स्वाती बिहार के मुजफ्परपुर के चतुर्भुज स्थान पहुंचीं. ये जगह भारत-नेपाल सीमा के करीब है. पुराने समय में ढोलक, घुंघरुओं और हारमोनियम की आवाज ही इस जगह की पहचान हुआ करती थी. लेकिन अब इस जगह को रेड लाइट एरिया और यहां गाने-नाचने वाली महिलाओं को 'प्रोस्टिट्यूट' का टैग दे दिया गया है.

स्वाति ने यहां कुछ तवायफों से बात की. उनसे पूछा कि वो इस काम में कैसे आईं. उनका बचपन कैसे बीता. और सबसे जरूरी बात कि लोग उन्हें किस नजर से देखते हैं. लोगों से उन्हें किस तरह के ताने सुनने पड़ते हैं. वो कथित आदर्श समाज का हिस्सा क्यों नहीं मानी जाती हैं.

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परवीना कहती हैं कि उनकी तमन्ना है कि लोग उन्हें इज्जत दें. अच्छी बातें कहें. लेकिन क्योंकि वो इन बदनाम गलियों में रहती हैं, तो वो कितनी भी सही क्यों न हों, लोग उन्हें देह व्यापार करने वालों के तौर पर ही देखते हैं. लेकिन वो कलाकार हैं.

रूबी कहती हैं कि दोष उनके काम का नहीं है. लोग इस जगह को गलत मानते हैं. परिवार के लोग गलत बातें करते हैं. लेकिन उनका यही रोजगार है, ये सब सुनना होता है. इसी से उनका परिवार चलता है, बाल-बच्चे पलते हैं.

वो कहती हैं कि उनकी नानी, परनानी, बुआ भी कलाकार थीं. लेकिन उस समय की बात अलग थी. तब लोग कलाकारों की इज्जत करते थे. नाचने-गाने वाली महिलाएं भी शान से जीती थीं. लेकिन अब लोग उन्हें गंदी नजरों से देखते हैं.

उन्होंने ये भी बताया कि गम में डूबे लोग सैड सॉन्ग सुनाने को भी कहते हैं.

आप भी देख सकते हैं कि इन महिला कलाकारो ने और क्या-क्या बताया...

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