JDU प्रवक्ता ने मीसा भारती पर ऐसी टिप्पणी कर दी है कि भाई तेज प्रताप तमतमा उठे हैं

सोच-समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति तमतमा उठेगा.

कहानी अजब है, गजब है. ध्यान दो तो सर दुखेगा ना दो तो घूम जाएगा. पॉलिटिक्स की दुनिया का सब अल्लम गल्लम आजकल ट्विटर पर निकलता है. 280 शब्दों में जहर, कचरा, प्रेम, दुलार, कीचड़ सब उछाला जा रहा होता है इधर उधर. उसमें ही कुछ कुछ ऐसे होते हैं जो अलग से नज़र आते हैं. इनकी जबान पहचान में आ जाती है.

ऐसे ही बयान देने वाले एक और साहब हैं. नीरज कुमार. जनता दल यूनाइटेड से नेता हैं. बिहार में जद यू की सरकार है. नीतीश कुमार की लीडरशिप में. विपक्ष वहां पर लालू यादव की राजद पार्टी है. अभी काफी ड्रामा चल रहा है उसमें, पूरी रामायण क्या ही सुनायेंगे आपको. उसमें से जरूरी बात निकाल कर बता देते हैं. लालू यादव के छोटे बेटे तेजस्वी पॉपुलर हैं. पार्टी की कमान संभाल रहे हैं. बड़े बेटे तेज प्रताप को कृष्ण कहलाने का शौक है तो वो गैया चराते हैं, बांसुरी बजाते हैं. मथुरा वृन्दावन ये जा वो जा करते रहते हैं. इसी बात पर नीरज कुमार ने ट्वीट किया. पढ़ लें:

अब भाईयों को रामलक्ष्मण-भारत-शत्रुघ्न की तरह पदवी देकर उनकी तुलना करना चलो एकबारगी मान भी लिया जाए. मिथक और लोकप्रिय प्रतीकों का इस्तेमाल करके आम तौर पर पब्लिक डिस्कोर्स में बात की जाती है, उदाहरण दिए जाते हैं. यहां मीसा भारती को शूर्पनखा कहने का क्या तुक है?

अब ब्रेक लेते हैं. थोड़ा पीछे चलते हैं. ज्यादा नहीं. अभी पिछले साल ही राज्य सभा में पीएम मोदी ने कुछ ऐसा ही कहा था. कांग्रेस लीडर रेणुका चौधरी सदन में उन पर हंस दी थीं. पीएम मोदी ने कहा, रामायण सीरियल के बाद ऐसी हंसी अब सुनने को मिली है. इशारा किसी ऐसी किरदार की तरफ ही था जो अट्टहास करती हो. ताड़का और शूर्पनखा पर ध्यान सायास जाता है.

अब चंद सवाल.

  1. शूर्पनखा को इस तरह के किरदार की तरह ट्रीट किया जाता है, जिसे शर्मिंदा करके लक्ष्मण ने बेहद अच्छा किया. प्रेम निवेदन किया था उसने श्रीराम को, फिर लक्ष्मण को. शादी-शुदा पुरुष थे दोनों तो उन्होंने मना कर दिया. बहुत बढ़िया बात. शूर्पनखा गुस्से में आई, हमला करने को हुई तो नाक काट ली गई. अब इसमें कितना सही है कितना गलत है इस पर बहस सालों-साल चल सकती है. लेकिन फिर भी, यहां शूर्पनखा की उपाधि मीसा को देना कैसे जंचता है? मीसा तो बहन हैं तेज प्रताप और तेजस्वी की. शूर्पनखा रावण की बहन थी. लेकिन आप भाइयों को राम- भारत की उपमा दे रहे हैं. फिर कैसे चलेगा? दिमाग फ्यूज हो रहा है. लिखने से पहले सोचे नहीं थे क्या? 

    shoorp-ramanand-sagar_750x500_010719122216.jpgरामानंद सागर के सीरियल रामायण में शूर्पनखा नाकविहीन होने के बाद ऐसी दिखी थी. तस्वीर: रामानंद सागर प्रोडक्शन्स

  2. शूर्पनखा का ट्रोप कोई नया नहीं है. जहां रामचरितमानस में शूर्पनखा का किरदार ऐसा लिखा गया है जो राम लक्ष्मण को देखकर विकल हो जाती है. 

    सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी॥

    पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा॥

    भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी॥

    होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी॥

    रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई॥

    तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह संजोग बिधि रचा बिचारी॥  

    अब यहां तक एक स्त्री का अपने मन के पुरुष का चुनाव करना खल जाता है लोगों को. शूर्पनखा का किरदार हर उस स्त्री के लिए उपमा देने के काम में लिया जाता है जो अपने चुनाव खुद करती है. स्वतंत्र है. पब्लिक की नजर में आने से न झिझकने वाली औरत को भी शूर्पनखा कह दिया जाता है. 

    misa_750x500_010719122323.jpgराजनीति हो या मीडिया, मुखर औरतें सही हों या गलत, बेसिर पैर की बातें झेलती ही हैं.

  3. साफ़ मतलब यही बनता है कि बात किसी किरदार से समानता की या उसकी ऐतिहासिक सटीकता की नहीं है. आप औरत जात को नीचा समझेंगे, उनसे घृणा करेंगे, उनको अपमानित करना चाहेंगे, तो उनको कुछ भी कहने का मौका नहीं चूकेंगे. वैसे भी स्त्री का देवी नहीं तो दैत्यमाता (दिति/अदिति का ट्रोप) वाला जो एक संस्कार बिठा दिया गया है लोगों के मन में उसे काउंटर करना आसान नहीं है. उससे बाहर निकलकर उपमान और उपमेय ढूंढना लोगों को मेहनत का काम लगता है. समय में आ रहे बदलावों के साथ पहले से प्रचलित उपमानों, उपमेयों, और उपमाओं को भी झाड़ने पोंछने की ज़रूरत है. माना कि मीसा भारती भ्रष्ट होंगी, माना कि घोटाले में उनका लेना-देना कहीं ना कहीं से होगा. माना उनकी पॉलिटिक्स महाबकवास होगी. लेकिन उसे क्रिटिसाइज ऐसे करेंगे तो कहां के रहेंगे? ये तो वही बात हो गई कि चावल कच्चे रह गए खाने में तो मैं कहूं लाल किला कम लाल है इसलिए ऐसा हुआ. 

बाकी सबसे ज्यादा ज़रूरत इन नेताओं को ट्रेनिंग लेने की है. बोलना सीख गए दो साल की उम्र में, कहां  नहीं बोलना है और क्या नहीं बोलना है ये सीखने में बुढ़ाते जा रहे हैं.    

 

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