डियर आयुषी, हमारी हर बात मानकर रोबोट न बन जाना

प्यारी बच्ची, तुम्हें किसी के जैसा नहीं बनना. अपने स्वभाव में किसी को देखकर बदलाव नहीं लाना.

आशुतोष चचा आशुतोष चचा
नवंबर 15, 2018
प्रतीकात्मक तस्वीर- Pixabay

तुमने कल मेरा भेजा खाया था, तुमको याद होगा. तुम बता रही थी कि कियारा स्वेटर के ऊपर टाई पहनकर आती है. तुमको भी जाना है टाई लगाकर. तुम्हें सबके टिफिन का पता रहता है कि कौन क्या लाया था. अगले दिन तुम वही सब ले जाना चाहती हो. लेकिन एक बात बताओ. रोज मैगी या ब्रेड जैम कौन खाता है? कभी आलू वालू भी खाओ. अरबी की सब्जी मेरी फेवरेट है लेकिन मैं वो रोज़ तो नहीं खाता. तुम भी कहोगे कि 'पापा रोज रोज घुइंयां क्यों खाते हो?' फिर तुम क्यों सबकी देखा देखी रोज़ एक ही चीज की जिद करती हो.

आप पढ़ रहे हैं हमारी सीरीज- 'डियर आयुषी'. रिलेशनशिप की इस सीरीज में हम हर हफ्ते 'चचा' की एक चिट्ठी पब्लिश करेंगे. वो चिट्ठी, जिसे वह अपनी बेटी आयुषी के लिए लिखते हैं. इन चिट्ठियों से आपको ये जानने को मिलेगा कि एक पिता अपनी बेटी के लिए क्या चाहता है. ये चिट्ठियां हर उस पिता की कहानी बयान करेंगी, जिनके लिए उनकी बेटी किसी 'परी' से कम नहीं होती, जिनके लिए उनकी बेटी कुदरत की सबसे प्यारी रचना होती हैं.

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हालांकि ये तो तुम्हारे खेल हैं, मुझे बहुत भाते हैं. मैं इन सबसे निपट सकता हूं. लेकिन सीरियसली तुम्हें रोबोट बनते नहीं देखना चाहता. तुम पूछो कि रोबोट कैसे होते हैं? 'वीर-द रोबो बॉय' की बात नहीं हो रही है. कार्टून बहुत अच्छे होते हैं, क्योंकि उन्हें बनाने वाले इंसान बहुत भले होते हैं. तुमने डॉनल्ड डक, गूफी, विनी द पूह, प्लूटो, डक टेल्स तो देखा नहीं है. उनमें जो एडवेंचर था वो बताना मुश्किल काम है. तुम्हारा रोबो बॉय इंसानों जैसा है. लेकिन कुछ इंसान असल में रोबोट जैसे होते हैं.

father-2606964_960_720_750x500_111518051005.jpgप्रतीकात्मक तस्वीर- Pixabay

रोबोट बनाने का काम पहले तो घर में शुरू होता है. जब मम्मियां बच्चों को 'शर्मा जी का लड़का' बनाना चाहती हैं. दूसरा स्टेप स्कूल में रखा जाता है. वो तो सभ्य इंसान बनाने की नहीं, रोबोट बनाने की ही प्रयोगशाला है. मेरे साथ पढ़ने वाले लड़के जो सबसे तेज थे, उनको ही सारी जिम्मेदारी दे दी जाती थी. स्कूल में प्रार्थना कराना, क्लास मॉनिटर बनाना, इवेंट्स और वार्षिकोत्सव में उनको ही रट्टू तोता बनाकर कविताएं पढ़वाना, सारे मौके उनके लिए खुले थे. खेल में भी उनको ही पहले मौका दिया जाता था. लेकिन बीड़ी बॉडी से पढ़ाई अच्छी हो सकती है, कबड्डी नहीं. उनके बाहर होने पर मजबूत कद काठी वाले लड़कों का चयन होता था. लड़कियों की जिम्मेदारी खो-खो तक थी. मेरे जैसे बिलो एवरेज बच्चे उन सबकी परफार्मेंस पर ताली बजाने के लिए और रोज पिटने के लिए होते थे.

hands-1920854_960_720_750x500_111518051024.jpgप्रतीकात्मक तस्वीर- Pixabay

स्कूलों का नियम यही है कि वहां जो तेज है, आक्रामक है, ब्रिलिएंट है, वो नमूना है. बाकी सबको उसकी कॉपी करना है. यही रोबोट बनाने की प्रक्रिया है. स्कूल जाकर बच्चों की बहुमुखी प्रतिभा का विकास होना चाहिए लेकिन वहां एक सूत्री कार्यक्रम चलता है. जिसमें मां बाप बराबर के भागीदार होते हैं. अब तो ये सिस्टम काफी हद तक कमजोर हो गया. उस टाइम पापा लोग स्कूल में जाकर टीचर्स से बोलते थे 'ये पढ़ता नहीं है. खेलने में बड़ा मन लगता है. कूटो इसको.' अब कुटाई कंट्रोल में है लेकिन गधा बनाकर एक समान बोझ रखना जारी है. तुम्हें किसी को देखकर कुछ नहीं करना. तुम्हें किसी के जैसा नहीं बनना. अपने स्वभाव में किसी को देखकर बदलाव नहीं लाना. तुम्हारा खेल-कूद, इनोसेंस, कार्टून देखना, मम्मी पापा से झगड़ना, हमें ताने देना, दौड़कर पापड़ और पॉपकार्न वालों को रोकना हमें उतना ही प्रिय है जितना तुम्हारा पोयम याद करना.

parent-863085_960_720_750x500_111518051038.jpgप्रतीकात्मक तस्वीर- Pixabay

तुम क्या देखकर या करके प्रेरित हो जाओ और आगे जीवन में क्या कर डालो, ये हमको नहीं पता. तुम बड़ी होकर बड़ा और रिमार्केबल लोगों की कहानियां पढ़ोगी तो पता लगेगा कि उन्होंने किसी छोटी सी चीज से इंस्पिरेशन ली और बहुत बड़ा काम कर डाला. लेकिन वो रोबोट नहीं बने. अभी कुछ दिन पहले ही तमाम सुपरहीरो बनाने वाले स्टैन ली का निधन हुआ है. वो आज की पीढ़ी के क्रिएटिव युवाओं के रोल मॉडल हैं. वो 40 साल की उम्र में जब कॉमिक्स रचते हुए संकोच कर रहे थे तो उनकी पत्नी ने कहा, तुम इसके लिए बूढ़े नहीं हुए हो. पत्नी की इंस्पिरेशन ने, छोटी सी बात ने उन्हें कल्ट बना दिया. अगर वो किसी की कॉपी करके रोबोट बनते तो आज उनका नाम तुम यहां न पढ़ रही होती.

 

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