डियर आयुषी,कभी भी अपनी जिंदगी की डोर किसी और के हाथ मत आने दो

लोगों को समझने में इतनी देर हो जाती है कि तगड़ी चोट लग जाती है

आप पढ़ रहे हैं हमारी सीरीज- 'डियर आयुषी'. रिलेशनशिप की इस सीरीज में हम हर हफ्ते 'चचा' की एक चिट्ठी पब्लिश करेंगे. वो चिट्ठी, जिसे वह अपनी बेटी आयुषी के लिए लिखते हैं. इन चिट्ठियों से आपको ये जानने को मिलेगा कि एक पिता अपनी बेटी के लिए क्या चाहता है. ये चिट्ठियां हर उस पिता की कहानी बयान करेंगी, जिनके लिए उनकी बेटी किसी 'परी' से कम नहीं होती, जिनके लिए उनकी बेटी कुदरत की सबसे प्यारी रचना होती हैं. 

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 डियर आयुषी,

अभी देखा कि प्लास्टिक के खिलौने वाले टुकड़े जोड़कर तुम घर, रेलगाड़ी और पता नहीं क्या क्या बना रही हो. और बिगड़ जाने पर झल्लाकर सब उलट पलट देती हो. क्योंकि फिजिक्स के नियम तुमको मालूम नहीं हैं. तुम्हें नहीं पता कि इनको जोड़कर कितना ऊंचा पिलर बना सकती हो. आखिर गिरेंगे ही. फिर तुम नाराज होकर उठापटक करती हो. मेरे समझाने का भी तुम पर कोई असर नहीं पड़ रहा. तुम अपनी स्पीड में चीज़ें बना और बिखेर रही हो. बाकी सब मजेदार है लेकिन गुस्सा खून जलाता है मेरे बच्चे. फर्जी गुस्सा करके उस प्लास्टिक का क्या बिगाड़ लोगी तुम. लेकिन कोशिश कर रही हो. ये बात तुम्हें नहीं, मुझे समझनी चाहिए. 

game-750x500_020719085355.jpgसांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे

मैं हर बार तुम्हें समझाने में खर्च नहीं होना चाहता. इतनी समझदारी मजबूत नहीं है मेरी कि तुम्हें दुनिया भर के नियम समझाऊं. हां, अपने अनुभव बताता चल रहा हूं. जैसे तुम अभी फिजिक्स के नियम नहीं समझती, वैसे ही मैं दुनिया के और जिंदगी के नियम नहीं समझता. हालांकि मेरी CV में क्विक लर्नर लिखा है, लेकिन जिंदगी के सबक सीखने में मुझे अक्सर देर हो जाती है. मुसीबत का अहसास तब होता है जब वो सिर पर आकर खड़ी हो जाती है, बचने का कोई रास्ता नहीं बचता. लोगों को समझने में इतनी देर हो जाती है कि तगड़ी चोट लग जाती है.

पता नहीं मुझे इतनी पकाऊ बात करनी चाहिए या नहीं. लेकिन ये पता है कि जब जैसा मूड हो उसी के हिसाब से बात करनी चाहिए. तो मैटर ये है कि जीवन के रास्ते में लोग हमको मिलते हैं. हमारी जिंदगी को कभी आसान बनाते हैं, कभी मुश्किल. कोई मौज देता है तो कोई टेंसन. टेंसन देने वालों, मुश्किल पैदा करने वालों को हम बड़े प्यार से किनारे कर देते हैं. बचते हैं वो, जिनके साथ मौज थी. हम समझते हैं कि यार ये बहुत सही है. इसका साथ रहे तो अपन बादल में पत्थर मारकर पानी बरसा लेंगे. कई बार उस पर इतना डिपेंड हो जाते हैं कि अपना हर स्वार्थ उसके माथे छोड़ देते हैं. कि यार ये जो करेगा, हमारे लिए सही ही करेगा. 

betray-750x500_020719085416.jpgसांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे

लेकिन जैसे फिजिक्स के नियम हैं वैसे ही रिश्तों के भी. उनकी प्रायोरिटी और महत्व बदलता रहता है. यहीं स्लो लर्नर लोग मात खा जाते हैं. उन्हें पता ही नहीं चलता कि जिसके माथे वो अपने भाग्य की डोर सौंपे हैं, उसकी प्रायोरिटी बदल चुकी है. उसने अपने गोल्स सेट कर लिए हैं जिनमें मिस्टर/मिस स्लो लर्नर कहीं नहीं हैं. सबसे बुरा तब होता है जब उस शख्स की हरकतों से मिल रहे इशारों को भी स्लो लर्नर इग्नोर करता है. फिर खाता है गच्चा. जब समझ में आता है कि यार यहां तो ठगी का शिकार हो गए. 

lonely-750x500_020719085435.jpgसांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे

असल में ये कोई धोखा नहीं है जिसकी शिकायत की जाए. ये वही रिश्ते और दुनिया का नियम है जिसके तहत सब कुछ बदलता है. वक्त रहते जो इस बदलाव को भांप लेता है वो स्मार्ट मूव ले लेता है. जो नहीं समझ पाता वो बाद में बैठ के लमतूरा बजाता है. तो बच्चा मुद्दा ये है कि किसी भी शख्स पर बेशक भरोसा करो, लेकिन इससे भी ज्यादा भरोसा इस फैक्ट पर करो कि वो इंसान है. वो कभी भी बदल सकता है. प्लान बी के लिए हमेशा तैयार रहो. कभी भी अपनी जिंदगी की डोर किसी और के हाथ मत आने दो.

 

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