'प्यारी बेटी, तुमने टपकते नल को बंद कर आज मेरा दिन बना दिया'

एक पिता की अपनी बेटी को लिखी इस चिट्ठी से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं.

आशुतोष चचा आशुतोष चचा
नवंबर 29, 2018
सांकेतिक इमेज- यूट्यूब स्क्रीनशॉट

आप पढ़ रहे हैं हमारी सीरीज- 'डियर आयुषी'. रिलेशनशिप की इस सीरीज में हम हर हफ्ते 'चचा' की एक चिट्ठी पब्लिश करेंगे. वो चिट्ठी, जिसे वह अपनी बेटी आयुषी के लिए लिखते हैं. इन चिट्ठियों से आपको ये जानने को मिलेगा कि एक पिता अपनी बेटी के लिए क्या चाहता है. ये चिट्ठियां हर उस पिता की कहानी बयान करेंगी, जिनके लिए उनकी बेटी किसी 'परी' से कम नहीं होती, जिनके लिए उनकी बेटी कुदरत की सबसे प्यारी रचना होती हैं. 

 

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आज मैं सवेरे सवेरे तुमको स्कूल लेकर जा रहा था. रास्ते में तुम मेरा हाथ छुड़ाकर भागी. मुझे तुम्हारी चिंता 100 गुना एक झटके में बढ़ जाती है. जब तुम रास्ते में ऐसे हाथ छुड़ाकर भागती हो. इतनी गाड़ियां आती जाती रहती हैं. जान अटकी रहती है मेरी. पता नहीं ये फिक्र कब छूटेगी. हालांकि जब मैंने तुमको देखा कि तुम हाथ छुड़ाकर क्या करने गई हो, तो मुझे बहुत सुकून मिला. रास्ते में पानी का एक नल खुला हुआ था. पूरी तरह नहीं लेकिन काफी पानी उससे बह रहा था. तुमने जाकर उसे बंद किया और दौड़कर वापस आ गई. फिर शेखी बघारने लगी कि आपकी बेटी ने एक अच्छा काम किया. वो अच्छा काम नहीं, बहुत अच्छा काम था. 

hose-1310436_1920_750_112918054416.jpgतुम्हारा ध्यान वहां गया जहां किसी का नहीं जाता. सांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे

बचपन से मैंने अपने घर में कांस्ट्रक्शन का काम होते देखा. छोटी सी नौकरी वाले मेरे पापा गांव में कोई घर नहीं, ताजमहल बनवा रहे हैं. बिना किसी नक्शे के उसमें काम चलता ही रहता है. उसमें कब किस कोने में कौन सी डिजाइन बन जाए ये न तो मेरे पापा जानते हैं, न ही बनाने वाला. वो बन जाने के बाद राज़ खुलता है कि अच्छा ये बन रहा था. मैं बात उस माइक्रो एंटीलिया बिल्डिंग की नहीं, बिल्डिंग मैटीरियल की बताना चाहता था. मजदूर लोग कहीं भी कोई काम करते हुए जी भर कर मसाला बरबाद करते हैं. हो सकता है वो इस फ्रस्टेशन में करते हों कि ये चिरकुट हमारी मजदूरी लटका देता है, या कोई और बात हो. लेकिन यूं चीजें बरबाद करना वो एंजॉय करते हैं. 

cons_112918054224.jpgसांकेतिक तस्वीर: इंडिया टुडे 

तुम अपने दोस्तों से बात करोगी तो वो तुम्हें ऐसे रिश्तेदारों के बारे में बताएंगे जो घर आते हैं तो सब निपटा जाते हैं. वो साबुन, तेल से लेकर घर की गाड़ी तक का इस्तेमाल ऐसे करते हैं जैसे सरकारी हो. हम भारतीय लोग चीजों की बरबादी में एक तरह का सुख प्राप्त करते हैं. जिसमें अपना खून पसीना या पैसा न लगा हो. कई लोग तो इतने निर्मम होते हैं जो अपने ही घर में अपनी कमाई की चीजों को ही बरबाद करते हैं. बिना रोशनी की जरूरत के लाइट्स जलाकर रखना, पंखे या एसी चलाकर रखना, रेड लाइट पर भी गाड़ी बंद न करना, ये सब कर सकते हैं. इसलिए करते हैं क्योंकि वो अफोर्ड कर सकते हैं ये बरबादी. उन्हें नहीं मालूम होता किसी के लिए इन चीजों की बड़ी कीमत होती है. 

bulb_750_112918054257.jpgलोगों को बर्बादी की आदत है. सांकेतिक तस्वीर: ट्विटर

अगर उन्हें पता हो कि जो सौ वाट के बल्ब वो दिन भर बेवजह जलाकर रखते हैं, इतनी रोशनी अपने ही देश के किसी गांव ने अभी तक नहीं देखी. उन्हें पता हो कि जो पानी वो गाड़ी धोने, सड़क धोने और धूल पाटने के लिए बरबाद करते हैं, उसे लाने के लिए इसी देश की कुछ महिलाओं को कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. सिर पर कई मटके रखकर. कहीं लाइन लगानी पड़ती है दिन भर. तो शायद वो ऐसा न करें. लेकिन समस्या ये है कि ऐसी सूचना लिखे में या वीडियो में उनके सामने महीनों में एक बार 5-10 मिनट के लिए पहुंचेगी. लेकिन पानी बरबाद करने के लिए 24 घंटे उपलब्ध है. तो वो भूल जाते हैं.

water_750_112918054336.jpgसांकेतिक इमेज- ट्विटर

हैती नाम का एक देश है. वहां गरीबी और भुखमरी का ये हाल है कि कुछ इलाकों में लोग मिट्टी में पानी और चीनी मिलाकर उसकी रोटी बनाकर खाते हैं. करप्शन बहुत ज्यादा है वहां. मुझे यकीन है कि वहां भी लोग चीजों की बरबादी ऐसे ही करते होंगे. इंसानी सभ्यता का बुरा सिस्टम यही है. किसी की करनी किसी और को भुगतनी पड़ती है. दिल्ली में ही देखो. पॉल्यूशन भले पटाखे और पेट्रोल डीजल जलाने वाले फैलाएं लेकिन सांस तो सबकी खतम हो रही है. लेकिन तुमको आज वो नल का टैप बंद करते देख अच्छा लगा. मैं भी तुम्हारे जैसा हूं काफी हद तक. तुम्हारे इस काम ने मेरा दिन बना दिया.

 

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