डियर आयुषी: मैं मोबाइल से ज्यादा वक्त तुम्हें दूंगा

ये बीमारी बड़ों की है. तुम बच्चे इससे दूर रहो.

आशुतोष चचा आशुतोष चचा
अक्टूबर 11, 2018

आप पढ़ रहे हैं हमारी सीरीज- 'डियर आयुषी'. रिलेशनशिप की इस सीरीज में हम हर हफ्ते 'चचा' की एक चिट्ठी पब्लिश करेंगे. वो चिट्ठी, जिसे वह अपनी बेटी आयुषी के लिए लिखते हैं. इन चिट्ठियों से आपको ये जानने को मिलेगा कि एक पिता अपनी बेटी के लिए क्या चाहता है. ये चिट्ठियां हर उस पिता की कहानी बयान करेंगी, जिनके लिए उनकी बेटी किसी 'परी' से कम नहीं होती, जिनके लिए उनकी बेटी कुदरत की सबसे प्यारी रचना होती हैं.

तु्म्हारी हरकतें वैसे तो प्यारी हैं. लेकिन एक आदत तेजी से खराब हो रही है. मोबाइल में कार्टून देखने वाली. तुम्हारे साथ के बच्चे बिना मोबाइल हाथ में लिए खाना नहीं खाते. ये बात तुमको बड़ा इंस्पायर कर रही है. कई बार बोल चुकी हो. लेकिन मुझे परेशान कर रही है. तुम्हें याद है तीन दिन पहले हम लोग एक पार्क में गए थे. वहां बच्चे-बड़े सब खेल रहे थे. अपने अपने मोबाइल में. पता नहीं इन लोगों को मोबाइल गेम को आउटडोर गेम में कैसे बदल दिया. 

मां बाप अपने बच्चों को उन्हें बाकी बच्चों के साथ खेलने पार्क लाए थे. लेकिन थोड़ी देर में वो बोर हो गए और कें कें करते हुए मोबाइल मांगने लगे. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वो तो खेल रहे थे. मम्मी पापा मोबाइल में लगे थे. वो कोई शरारत करके अपने पापा या मम्मी को दिखाने के लिए ललचाते. लेकिन उनके पास ध्यान देने का वक्त ही नहीं था. तो वो अपनी हरकतें किसको दिखाते. सोचा कि छोड़ो ये लड़ना गिरना. चलकर मोबाइल में कार्टून देखते हैं. फिर मम्मी पापा से रोकर जिद करके मोबाइल ले लिया. अब मम्मी पापा बोर होने लगे. उनके पास बातचीत करने के जब मौके होते हैं तो मन नहीं होता. थोड़ी देर में शामियाना समेटकर चलते बने. बच्चे रोते रहे कि रुको मम्मी पापा. लेकिन वो किस बहाने रुकते. उनका खिलौना तो अब बच्चों के हाथ में था.

एक दिन मैंने देखा था कि पार्क में एक जोड़ा अपने बच्चे को बेसब्री से खोज रहा था. वो खेलते खेलते पार्क से बाहर निकल गया था और उनका पता भी न चला. क्योंकि दोनों मोबाइल में बिजी थे. थोड़ी देर में पूरा पार्क उनके बच्चे को खोज रहा था. मिल गया तो सबकी सांस में सांस आई. मैं खुद डर गया था और तुम्हारा हाथ मजबूती से पकड़ रखा था. तुम जब रास्ते पर हमारे साथ चलती हो तो कितनी बार डांटी जाती हो. कि हाथ छुड़ाकर मत भागो. अगर मैं ही लापरवाह होकर तुम्हारा हाथ छोड़ दूं तो मुझसे बड़ा बेवकूफ कौन होगा.

ये बीमारी बड़ों की है. तुम बच्चे इससे दूर रहो. बड़े जो हैं वो तो पक्के घड़े हो जाते हैं. उनको हम समझाने चलेंगे तो हमारे बाल नोचकर उनकी रजाई बनवा लेंगे क्योंकि सर्दी आ गई है. विंटर इज कमिंग. लेकिन तुमको मैं इससे अपनी क्षमता भर इस नशे से दूर रखने की कोशिश करूंगा. तुम्हें पता है कि मेरे पापा तुम्हें जमीन पर खेलने के लिए छोड़ देते थे गांव में. कहते थे धूल में खेलेगी तो मजबूत होगी. मिट्टी खेलना बहुत जरूरी है. खेलना जरूरी है, खाना नहीं. ये भी बताना पड़ता है क्योंकि तुम 5 साल की हो फिर भी हाथ में आने वाली हर चीज पहले तुम चखकर देखने लगती हो.

देखो हम लोग तो बरबाद हैं. मैं सीना फुलाकर कहता था कि हर नशे से दूर हूं. शराब, चरस, स्मैक, खैनी, केसर वाला पान मसाला, इन सबसे दूर हूं. सिगरेट की वजह से रन आउट भी नहीं होने जा रहा. लेकिन अभी लगता है कि एक लत लग चुकी है. हर 5 मिनट में फोन निकालकर नोटिफिकेशन चेक करने की लत. ये मेरे साथ तब है जब ये चरस मेरे हाथ चार-पांच साल पहले आई. बच्चे तो आजकल पैदा होते ही शुरू कर देते हैं. ये बहुत खतरनाक होगा. तुमको इससे दूर रहना होगा. इसीलिए मैंने तुम्हारे मनोरंजन के लिए बहुत सारी चीजों का जुगाड़ किया है. सबसे पहले तो खुद का. मैं तुम्हारे लिए अवैलेबल रहूंगा. तुम्हारी शैतानियां देखने के लिए. तुम जैसे ही कुछ उठापटक करके मुझे दिखाओगी, मैं देखूंगा. मैं अपने मोबाइल के नशे को तुम्हारे खेल पर शिफ्ट करूंगा. तुम्हारे साथ खेलूंगा. मैं मोबाइल से ज्यादा वक्त तुम्हें दूंगा.

 

 

 

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