दादी कहती थीं, 'अयोध्या में राम मंदिर बनेगा, तो चलेंगे', वो दुनिया से चली गईं और मंदिर बनता रहा

दादी तो अनपढ़ थीं. लेकिन हम तो नहीं है न.

लालिमा लालिमा
फरवरी 26, 2019
घर पर लगा पोस्टर भी इसी तस्वीर की तरह था (लेफ्ट). फोटो- ट्विटर\रॉयटर्स

छोटी थी, तब घर पर एक पोस्टर लगा था. पोस्टर में बहुत सुंदर सा और बड़ा सा मंदिर था, उसके पीछे की तरफ श्री राम खड़े थे. हाथ में बड़ा सा धनुष था, प्रत्यंचा चढ़ा रखी थी. और धनुष इस कदर तना हुआ था, कि लगता था कि बस अब चल ही जाएगा दुश्मन पर. ये पोस्टर घर के बैठक में लगा था. दादी सुबह उठतीं, नहा-धोकर पूजा करतीं, तो एक राउंड बैठक का भी लगा लेतीं. इस तस्वीर के सामने अगरबत्ती घुमा देतीं. कुछ मंत्र पढ़तीं. फिर पूजा के कमरे में जाकर आरती करतीं. मैं अक्सर ही दादी को ऐसा करते देखती थी. वो तस्वीर मुझे भी बहुत सुंदर दिखती थी. मन करता था वहां जाने का. मतलब मन में ये सोचती थी कि अगर ऐसी कोई जगह सच में होगी, तो जाऊंगी.

खैर, एक दिन दादी से मैंने पूछ ही लिया. वो सवाल पूछा जो कई दिनों से मेरे मन में था. यही कि 'दादी ये मंदिर सुंदर दिखता है? कहां है?' दादी ने अपनी भाषा में जवाब दिया,

'अयोध्या में हतो. अभी न है. किसी ने तोड़ दिया है. अभी फिर से बन रहो है, अयोध्या में ही. जब बन जाहे, तब चलेंगे भगवान राम के दर्शन करने.'

babri-masjid_650c_051914073131_1_0_750x500_022619044428.jpgदिसंबर 1992 में अयोध्या में बनी बाबरी मस्जिद को गिराते लोग, इसी जगह पर राम मंदिर बनाने की मांग हो रही है.

मेरे मन में भी ये बात बैठ गई कि मंदिर बन रहा है. मतलब एक सीन आंखों के सामने आ गया. उसमें ढेर सारे मजदूर मिट्टी ढोते दिखाई दिए. मैंने भी सोच लिया कि मंदिर बन रहा है. उसके बाद मैंने एक रूटीन सा बना लिया, दादी से सवाल पूछने का. 'दादी मंदिर कब तक बनेगा?' दादी का जवाब होता, 'टेम लगहे, भब्य मंदिर बन रहो है. (भव्य मंदिर बन रहा है, इसलिए समय लगेगा.)'

टाइम बीतता गया. मैं बड़ी हो गई. समझ आ गया कि मंदिर कब तक बनेगा? फिर मैंने दादी से सवाल पूछना भी बंद कर दिया. हमने घर शिफ्ट कर लिया. शिफ्टिंग के वक्त वो पोस्टर कहीं खो गया. मेरी दादी भी कहीं खो गईं. वो भूल गईं कि 'अयोध्या में मंदिर बन रहा था', और उन्हें दर्शन करने जाना था. क्योंकि वो बहुत बूढ़ी हो गई थीं. उम्र बढ़ने के साथ-साथ उनकी याददाश्त कमजोर हो गई थी. फिर एक दिन मेरी दादी दुनिया से ही चली गई. और 'अयोध्या में बनने वाले भव्य मंदिर' में जाकर दर्शन करने की उनकी इच्छा भी अधूरी रह गई. क्योंकि अभी मंदिर तो बन ही रहा है. दादी को गए हुए भी 6 साल हो गए. और मंदिर बन ही रहा है.

45340069_650409698687422_4900139509540192256_n_750x500_022619044602.jpgये तस्वीर सोशल मीडिया पर बहुत वायरल होती है. इमेजिनेशन वाली तस्वीर है. फेसबुक से ली है.

मेरी दादी की तरह न जाने कितनी दादियां ये सपना देख रही होंगी. कितनी दादियां और नानियां, ये सपना देखते-देखते दुनिया से उठ गई होंगी. उन्हें कौन समझाए, उन्हें कौन बताए कि अयोध्या में जो हो रहा है, वो होता ही रहेगा. मेरी दादी अनपढ़ थीं, इसलिए जो लहर चली, उसमें बिना सोचे-समझे बह गईं. उन्हें नहीं पता था कि जो लोग अयोध्या में राम मंदिर बनाने की बात कह रहे हैं, उन्हें किसी की आस्था या किसी के इमोशन्स से कोई लेना-देना नहीं है. उन्हें तो केवल वोट चाहिए वोट. उम्मीद है कि ये बात मेरी जनरेशन के लोगों को समझ आ चुकी होगी. पूरे लोगों को न सही, तो कम से कम आधों को तो आ ही गई होगी.

अयोध्या के नाम का बज़ क्रिएट करने वालों को मतलब नहीं है, कि वहां मंदिर बने या मस्जिद. उन्हें केवल एक चीज से ही मतलब है. वो है- वोट. इसलिए एक छोटी सी अपील है, मंदिर-मस्जिद के लिए लड़ना बंद कर दें. कुछ होने वाला नहीं है, न ही इससे कुछ मिलेगा.

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